Friday, February 10, 2012

इंसान

जो लोग जान बूझ के नादान बन गए
मेरा ख्याल है कि वो इंसान बन गए 

हम हश्र में गए मगर कुछ न पूछिए
वो जानबूझ कर वहाँ अनजान बन गए

हँसते हैं हम को देख के अरबाबे-आगाही
हम आपके मिजाज की पहचान बन गए

मंझधार तक पंहुचना तो हिम्मत की बात है
साहिल के आस पास ही तूफ़ान बन गए

इंसानियत की बात तो इतनी है शैख़ जी
बदकिस्मती से आप भी इंसान बन गए

कांटे बहुत थे दामने-फितरत में ऐ 'अदम'
कुछ फूल और कुछ मेरे अरमान बन गए.---"अदम' अब्दुल्हमीद

Wednesday, February 8, 2012

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था |
थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दाँया हाथ फड़कता था ||

मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुए
उनमें से भी कुछ स्कूल तलक, आते-आते बर्बाद हुए

तुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलाया
मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आया

पर्चा हाथों में पकड़ लिया, ऑंखें मूंदीं टुक झूम गया
पढ़ते ही छाया अंधकार, चक्कर आया सिर घूम गया

उसमें आए थे वे सवाल जिनमें मैं गोल रहा करता
पूछे थे वे ही पाठ जिन्हें पढ़ डाँवाडोल रहा करता

यह सौ नंबर का पर्चा है, मुझको दो की भी आस नहीं
चाहे सारी दुनिया पलटे पर मैं हो सकता पास नहीं

ओ! प्रश्न-पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम
तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी, ये पर्चा है या एटम-बम

तूने पूछे वे ही सवाल, जो-जो थे मैंने रटे नहीं
जिन हाथों ने ये प्रश्न लिखे, वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं

फिर ऑंख मूंदकर बैठ गया, बोला भगवान दया कर दे
मेरे दिमाग़ में इन प्रश्नों के उत्तर ठूँस-ठूँस भर दे

मेरा भविष्य है ख़तरे में, मैं भूल रहा हूँ ऑंय-बाँय
तुम करते हो भगवान सदा, संकट में भक्तों की सहाय

जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया तुमने ही उसे बचाया था
जब द्रुपद-सुता की लाज लुटी, तुमने ही चीर बढ़ाया था

द्रौपदी समझ करके मुझको, मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम
मैं विष खाकर मर जाऊंगा, वर्ना जल्दी आ जाओ तुम

आकाश चीरकर अंबर से, आई गहरी आवाज़ एक
रे मूढ़ व्यर्थ क्यों रोता है, तू ऑंख खोलकर इधर देख

गीता कहती है कर्म करो, चिंता मत फल की किया करो
मन में आए जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो

मेरे अंतर के पाट खुले, पर्चे पर क़लम चली चंचल
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल

मैंने लिक्खा पानीपत का दूसरा युध्द भर सावन में
जापान-जर्मनी बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में

लिख दिया महात्मा बुध्द महात्मा गांधी जी के चेले थे
गांधी जी के संग बचपन में ऑंख-मिचौली खेले थे

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था
अकबर ने हिंद महासागर, अमरीका से मंगवाया था

महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था
औरंगजेब रंग में आकर औरों की जेब काटता था

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे पर लिख मारे

हो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख
बोला- इन सारे छात्रों में, बस होनहार है यही एक

औरों के पर्चे फेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए |
जीरो नंबर देकर बाकी के सारे नंबर काट लिए ||


मूल रचनाकार - ओम प्रकाश आदित्य

Saturday, February 4, 2012

मेरी दुनिया में बन्दे के खुदा होने का वक़्त आया

शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आया
मेरी दुनिया में बन्दे के खुदा होने का वक़्त आया

उन्हें देखा तो जाहिद ने कहा ईमान की ये है
कि अब इंसान के सिजदा रवा होने का वक़्त आया

तकल्लुम की ख़ामोशी कह रही है हर्फे-मतलब से
कि अश्क-आमेज नज़रों से अदा होने का वक़्त आया

खुदा जाने ये है औजे-यकीं या पस्ती-ए-हिम्मत
खुदा से कह रहा हूँ नाखुदा होने का वक़्त आया

हमें भी आ पडा है दोस्तों से काम कुछ यानी
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक़्त आया----पंडित हरिचंद 'अख्तर'

अश्क-आमेज=आंसू भरी, औजे-यकीं=विश्वास की पराकाष्टा, पस्ती-ए-हिम्मत=साहस.

कितनी  गूढ़ सच्चाई छिपी है इस ग़ज़ल में, ज़रा सोचिये 

Friday, February 3, 2012

अमन की बात करे जब, करे तकरार के साथ

एक कमाल की कविता मिली यहाँ वहां घुमते हुए, आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ. कवि का नाम है कट्टा कानपुरी: 

अमन की बात करे जब, करे तकरार के साथ,
मिला करे है गले भी, मगर तलवार के साथ.

बताये मार्क्स, माओ, लेनिन को अपना रहबर
दौड़ता रहता है वो भी, इसी बाज़ार के साथ.

वक़्त के साथ पैमाना भी खाली,महफ़िल भी
लिपटकर रोयेगा फिर वो किसी दीवार के साथ

मिटाकर चंद गरीबों को हुकूमत समझे
मुल्क अब दौड़ेगा तेजी से इस संसार के साथ

न समझा है, न समझेगा वो खामोशी की ताक़त
पड़ोसी फिर मिलेगा झूठी इक ललकार के साथ

हमें उम्मीद थी जिससे कि, उठाएगा सवाल
दिखाई रोज देता है वही सरकार के साथ

समझते हैं सभी 'कट्टा' को सितमगर लेकिन
खड़ा मिलेगा हमेशा किसी हकदार के साथ

Friday, January 20, 2012

मूर्ख अधिक या समझदार-अकबर बीरबल किस्सा

एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा, बीरबल ज़रा बताओ टू उस दुनिया मी किसकी संख्या अधिक है, जो देख सकते हैं या जो अंधे हैं ? बीरबल बोले, इस समय तुरंत तो आपके इस सवाल का जबाब देना मेरे लिए सम्भव नहीं है लेकिन मेरा विश्वास है की अंधों की संख्या अधिक होगी वजाय देख सकने वालों के

बादशाह ने कहा की तुम्हे अपनी बात सिद्ध करके दिखानी होगी, बीरबल ने बादशाह की चिनौती स्वीकार कर ली

अगले दिन बीरबल बीच बाज़ार मी एक बिना बुनी हुई चारपाई लेकल बैठ गए और उसे बुनना शुरू कर दिया, उसके अगल-बगल दो आदमी कागज़-कलम लेकर बैठे हुए थे

थोडी ही देर मे वहाँ भीड़ इक्कठी हो गई यह देखने के लिए कि हो क्या रहा है, वहाँ मौजूद हर व्यक्ति ने बीरबल से एक ही सवाल पूछा “बीरबल तुम क्या कर रहे हो ? “

बीरबल के अगल-बगल बैठे दोनों आदमी ऐसा सवाल कराने वालों का नाम पूछ पूछ कर लिखते जा रहे थे, जब बादशाह के कानो तक ये बात पहुँची कि बीच बाज़ार बीरबल चारपाई बुन रहे हैं तो वो भी वहाँ जा पहुंचे और वही सवाल किया “यह तुम क्या कर रहे हो?”

कोई जबाब दिए बिना बीरबल ने अपने बगल मे बैठे एक आदमी से बादशाह अकबर का भी नाम लिख लेने को कहा तभी बादशाह ने आदमी के हाथ मे थमा कागज़ का पुलिंदा ले लिया उस पर लिखा था “अंधे लोगों की सूची”

बादशाह ने बीरबल से पूछा इसमे मेरा नाम क्यों लिखा है? बीरबल ने कहा “जहाँपनाह, आपने देखा भी कि मैं चारपाई बुन रहा हूँ, फ़िर भी आपने सवाल पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ”

बादशाह ने देखा उन लोगों की सूचि मे एक भी नाम नहीं था जो देख सकते थे, लेकिन अंधे लोगों की सूची का पुलिंदा बेहद भारी था ! बीरबल ने कहा “हुजुर, अब तो आप मेरी बात से सहमत होने कि दुनिया मे अंधों की तादाद ज्यादा है”

बीरबल की इस चतुराई पर बादशाह मंद मंद मुस्करा दिए...... 

‘क्रांतिकारी’-हरिशंकर परसाई


‘क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ, सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही। मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे-ग्वेवारा का खास भक्त।
कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता। खूब बातें करता। हमेशा क्रांतिकारिता के तनाव में रहता। सब उलट-पुलट देना है। सब बदल देना है। बाल बड़े, दाड़ी करीने से बढ़ाई हुई।
विद्रोह की घोषणा करता। कुछ करने का मौका ढूंढ़ता। कहता- “मेरे पिता की पीढ़ी को जल्दी मरना चाहिए। मेरे पिता घोर दकियानूस, जातिवादी, प्रतिक्रियावादी हैं। ठेठ बुर्जुआ। जब वे मरेंगे तब मैं न मुंडन कराऊंगा, न उनका श्राद्ध करूंगा। मैं सब परंपराओं का नाश कर दूंगा। चे-ग्वेवारा जिंदाबाद।”
कोई साथी कहता, “पर तुम्हारे पिता तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।”  
क्रांतिकारी कहता, “प्यार? हॉं, हर बुर्जुआ क्रांतिकारिता को मारने के लिए प्यार करता है। यह प्यार षणयंत्र है। तुम लोग नहीं समझते। इस समय मेरा बाप किसी ब्राह्मण की तलाश में है जिससे बीस-पच्चीस हजार रुपये लेकर उसकी लड़की से मेरी शादी कर देगा। पर मैं नहीं होने दूंगा। मैं जाति में शादी करूंगा ही नहीं। मैं दूसरी जाति की, किसी नीच जाति की लड़की से शादी करूंगा। मेरा बाप सिर धुनता बैठा रहेगा।”
साथी ने कहा, “अगर तुम्हारा प्यार किसी लड़की से हो जाए और संयोग से वह ब्राह्मण हो तो तुम शादी करोगे न?”
उसने कहा, “हरगिज नहीं। मैं उसे छोड़ दूंगा। कोई क्रांतिकारी अपनी जाति की लड़की से न प्यार करता है, न शादी। मेरा प्यार है एक कायस्थ लड़की से। मैं उससे शादी करूंगा।”
एक दिन उसने कायस्थ लड़की से कोर्ट में शादी कर ली। उसे लेकर अपने शहर आया और दोस्त के घर पर ठहर गया।
बड़े शहीदाना मूड में था। कह रहा था, “आई ब्रोक देअर नेक। मेरा बाप इस समय सिर धुन रहा होगा, मां रो रही होगी। मुहल्ले-पड़ोस के लोगों को इकट्ठा करके मेरा बाप कह रहा होगा ‘हमारे लिए लड़का मर चुका’। वह मुझे त्याग देगा। मुझे प्रापर्टी से वंचित कर देगा। आई डोंट केअर। मैं कोई भी बलिदान करने को तैयार हूं। वह घर मेरे लिए दुश्मन का घर हो गया। बट आई विल फाइट टू दी एंड-टू दी एंड।”
वह बरामदे में तना हुआ घूमता। फिर बैठ जाता, कहता, “बस संघर्ष आ ही रहा है।”
उसका एक दोस्त आया। बोला, “तुम्हारे फादर कह रहे थे कि तुम पत्नी को लेकर सीधे घर क्यों नहीं आए। वे तो काफी शांत थे। कह रहे थे, लड़के और बहू को घर ले आओ।”
वह उत्तेजित हो गया, “हूँ, बुर्जुआ हिपोक्रेसी। यह एक षणयंत्र है। वे मुझे घर बुलाकर फिर अपमान करके, हल्ला करके, निकालेंगे। उन्होंने मुझे त्याग दिया है तो मैं क्यों समझौता करूं। मैं दो कमरे किराए पर लेकर रहूंगा।”
दोस्त ने कहा, “पर तुम्हें त्यागा कहां है?”
उसने कहा, “मैं सब जानता हूं- आई विल फाइट।”
दोस्त ने कहा, “जब लड़ाई है ही नहीं तो फाइट क्या करोगे?”
क्रांतिकारी कल्पनाओं में था। हथियार पैने कर रहा था। बारूद सुखा रहा था। क्रांति का निर्णायक क्षण आने वाला है। मैं वीरता से लडूंगा। बलिदान हो जाऊंगा।
तीसरे दिन उसका एक खास दोस्त आया। उसने कहा, “तुम्हारे माता-पिता टैक्सी लेकर तुम्हें लेने आ रहे हैं। इतवार को तुम्हारी शादी के उपलक्ष्य में भोज है। यह निमंत्रण-पत्र बांटा जा रहा है।”
क्रांतिकारी ने सर ठोंक लिया। पसीना बहने लगा। पीला हो गया। बोला, “हाय, सब खत्म हो गया। जिंदगी भर की संघर्ष-साधना खत्म हो गयी। नो स्ट्रगल। नो रेवोल्यूशन। मैं हार गया। वे मुझे लेने आ रहे है। मैं लड़ना चाहता था। मेरी क्रांतिकारिता! मेरी क्रांतिकारिता! देवी, तू मेरे बाप से मेरा तिरस्कार करवा। चे-ग्वेवारा! डियर चे!”
उसकी पत्नी चतुर थी। वह दो-तीन दिनों से क्रांतिकारिता देख रही थी और हंस रही थी। उसने कहा, “डियर एक बात कहूं। तुम क्रांतिकारी नहीं हो।”
उसने पूछा, “नहीं हूं। फिर क्या हूं?”
पत्नी ने कहा, “तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो। पर मैं तुम्हें प्यार करती हूँ।”

जिंदगी थक गई मौत चलती रही- गोपाल दास नीरज


एक दिन देखता हूँ की रूठी हुई, चांदनी चन्द्रमा से खड़ी दूर है
एक दिन ये सुना फूल की चोट से, एक पाषाण का दिल हुआ चूर है
एक दिन आंसुओं ने कहा आँख से, रो ना हम आयेंगे कल बदल कर कफ़न
एक दिन एक बोला शलभ दीप से, चूम लूं मैं तुझे तब मुझे कर दफ़न
पर सुनी अनसुनी बात ऐसी हुई, रूठ सोया शलभ लौ मचलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन एक तारा गिरा टूट कर, एक उजड़े हुए नींद ने रख लिया
फूल ने तभी मुस्कुरा कर कहा, ये बुझा है दिया क्यों इसे दिल दिया
बोलने तब लगा नींद का एक त्रिण, हर दुखी को दुखी से सदा प्यार है
आंसुओं के लिए गोद बस धूल है, फूल को तो धरे शीश संसार है
किन्तु झगडा हुआ इस तरह ये ख़तम, फूल झड़ता रहा धूल खिलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन कह रही थी भ्रमर से कली, होंठ जूठे किये हैं मुझे तू न छू
कह रहा था भ्रमर सुन अरी बावली, निष्कलुष मैं बनू ले मुझे चूम तू
आ गया एक झोंका तभी उस तरफ, हिल उठी डाल तो भू-गगन हिल गए
कुनमुनाई लजाई कली तो बहुत, आप ही आप लेकिन अधर मिल गए
अंत ऐसे हुआ उस मिलन का मगर, दिन सिसकता रहा रात ढलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन ज़िंदगी की कड़ी धूप मे, दो पखेरू मिले मुक्त नभ के तले
कुछ ना बोले ना डोले ना कुछ बात की, हो गया प्यार लेकिन नयन जब मिले
होंठ ज्यों ही उठे तो नियती हंस पड़ी, आँधियाँ चल पड़ी तम बरसने लगा
छूट गया हाथ से हाथ भीगा हुआ, गालियाँ मार संसार हँसने लगा
और फिर यूँ कटी विरह की निशा, स्नेह बुझता रहा रात जलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक ऐसी हंसी हंस पड़ी धूल यह लाश इंसान की मुस्कुराने लगी
तान ऐसी किसी ने कहीं छेड़ दी आँख रोती हुई गीत गाने लगी
एक ऐसी किरण छू गई देह मे खुद-ब-खुद प्राण का दीप जलने लगा
एक आवाज़ आई किसी ओर से हर मुसाफिर बिना पाँव चलने लगा
बस इसी ताल पर उम्र की बांसुरी गीत गुनती रही सुर बदलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही