तमन्ना आज बगीचे
में अकेली घूम रही थी. सामने उसका पसंदीदा पौधा था; बेहद सुन्दर रंग वाले फूल
खिलते थे उसपर. केवल एक ही समस्या थी; उसमें कांटे थे...बहुत पैने कांटे जो कभी भी
चुभ सकते थे. पर तमन्ना को वह पौधा जान से प्यारा था. आज उसने फूलों से छेड़खानी की
ठान ली थी. जैसे ही उसने छूने की ठानी और हाथ लगाया काँटों से उसका हाथ छिल गया.
तमन्ना बेहद परेशान हुई और चली गयी. बाहर पार्क में घूमते हुए तमन्ना को एक छोटा
सा पौधा बहुत अच्छा लगा. गहरी नारंगी टहनियों के साथ उस पौधे में छोटे छोटे पत्ते
आये हुए थे. उन पत्तों को छेड़ने में तमन्ना को बहुत अधिक आनंद आ रहा था. तमन्ना ने
उस पौधे को अपने साथ ले लिया और चल दी अपने बगीचे की तरफ. बगीचे में उस पौधे को
लगा कर तमन्ना ने उसमे पहली बार पानी डाला. पौधे के पत्तों पर गिरा पानी तमन्ना को
भा रहा था. उस पौधे के साथ खेलना और अठखेलियाँ करना तमन्ना का हर रोज का कार्य हो
गया. पत्तों को हाथ में लेकर छेड़ना और हर रोज पानी देना. पौधा अब बड़ा हो रहा था.
एक दिन उस पौधे पर सुर्ख लाल रंग का फूल निकला. फूल ऐसा कि उसे देखना अपने आप में
तमन्ना के लिए बेहद सुखद अनुभव था. तमन्ना ने उस फूल को तोड़ लिया और अपने पास रख
लिया. सारा दिन उस फूल के साथ खेलने में बीता. लगातार मिल रहे ध्यान से वह पौधा
फूलों से घिर गया. अब तमन्ना अपने पुराने पौधे को देखती नहीं थी जिसके कारण उसके
हाथ कभी छिले थे. समय बीतता गया और साथ ही उस पौधे का और तमन्ना का रिश्ता और भी
पुख्ता हो गया. एक दिन तमन्ना ने देखा उसके पुराने पौधे पर आज बेहद सुंदर नारंगी
फूल निकला है. उस फूल की छटा उन लाल रंग के फूलों से कही ज्यादा सुन्दर थी. आज
तमन्ना ने नारंगी फूल को तोडा और अपने साथ ले गयी. दुसरे पौधे पर लगे लाल फूल के
बोझ से पौधा झुक गया और शाम होते होते वह फूल मुरझा गया. तमन्ना अब अपने पुराने
पौधे में पानी देती; उसके साथ खेलती. फूल आ रहे थे तो कांटे पीछे छिप गये. पर नए
पौधे पर लग रहे फूल अब सूख रहे थे. उन्हें कोई न सहलाता और कोई न तोड़ता. न ही उस
पौधे को पानी देता. तमन्ना के बगीचे में लगा नया पौधा अब सूखने लगा था. कुछ दिन यह
सिलसिला चलता रहा. एक दिन तमन्ना सुबह उठी और अपने नए पौधे को देखने के लिए चल पड़ी.
बाहर बागीचे में तमन्ना जैसे ही गयी तो देखा वह पौधा पूरी तरह से सूख चूका था.
पुराने पौधे पर लगे नारंगी फूल तमन्ना का इन्तजार कर रहे थे. सुर्ख लाल फूलों का
नामोनिशान मिट चूका था. न किसी ने उसके फूल ही तोड़े; न ही किसी ने इसे पानी ही
दिया. तमन्ना के बागीचे का नया पौधा मुरझा चुका था. पुराने पौधे पर अब भी फूल लग
रहे थे. पर अब वह पौधा नहीं बचा था जिसके फूलों से और पत्तों से तमन्ना को बहुत
प्यार था कभी.
पथ उस राही का जिसे न मंजिल पता है और न ही राह। उसे बस चलना आता है। राही को साथ ले भी और अकेले भी।
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Friday, August 7, 2015
Wednesday, October 22, 2014
ज्ञान असत्य है
समस्त ज्ञान असत्य है एवं समस्त सत्य ज्ञान का स्वरुप है। समस्त सांसारिक ज्ञान केवल मात्र तर्क की शक्ति पर टिका है एवं जब तक वह तर्क की सीमा को पार नहीं कर देता उसे संसार ज्ञान की श्रेणी में नहीं रखता। श्री रामकृष्ण परमहँस कहते हैं कि ज्ञान विश्वास से पैदा होता है न कि तर्क से। प्रथम आपकी बुद्धि स्वीकार करेगी उस उस अनजान को उसके बाद ही ज्ञान पैदा होगा एवं जन्म लेगा। यदि बुद्धि स्वीकार करने की स्थिति में होगी ही नहीं तो ज्ञान आ ही नहीं सकता। साकार ब्रह्म अथवा निराकार ब्रह्म दोनों ही उस ज्ञान के स्वरूप हैं। श्री परमहँस भी उस ज्ञान से जन्म लेते हैं तथा श्री दयानंद भी। जहाँ एक ओर हजरत मोहम्मद उस ही ज्ञान से जन्म लेते हैं तो दूसरी ओर ओशो भी उस ज्ञान का स्वरुप मात्र है। यदि हम इन परस्पर विरोधाभासी महापुरुषों को एक तर्क की श्रेणी में रखेंगे तो हम समझ पाएंगे कि सभी का ज्ञान अधूरा है। वहीँ दूसरी ओर यदि किसी एक के ऊपर दृढ विश्वास किया जाए तो सभी पूर्ण हैं। अतः स्पष्ट है कि विश्वास कीजिये कि तर्क के परे झाँका जा सकता है। माँ भारती आप सबका मार्ग प्रशस्त करे।
रविन्द्र सिंह ढुल
रविन्द्र सिंह ढुल
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Tuesday, July 22, 2014
अनजान राह का तन्हा राही
तन्हा राही राह चलता जाएगा; अब तो जो भी होगा देखा जाएगा। नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस के जीवन चरित्र पर बनी एक फिल्म के गीत के उपरोक्त बोल एक ऐसे बाग़ी के हैं जिसने स्वयं की राह चुनी एवं उस राह पर चल दिए। इन्हें न मंजिल की फ़िक्र थी और न ही रास्ते की। इन्हें यह भी फ़िक्र नहीं थी कि कोई इनके साथ था अथवा नहीं था। जीवन में बहुत सा ले आये और जीवन में बहुत सा पीछे छोड़ आये। पीछे मुड़ कर न देखा। बस चले गए और चले गए। समाज कहाँ इनको फ़िक्र नहीं ; व्यक्ति विशेष कहाँ इन्हें पता नहीं। राष्ट्र क्या ; उनकी सीमाएं क्या। बस परम सत्य यह है कि वे राही हैं और उनकी राह अबूझ है ;उनका तरीका अबूझ है और उसे कोई समझ न पाया है। अन्धकार कहाँ समझ पाया कि उसके बाहर रौशनी की किरण होती है। रौशनी कहाँ समझ पायी कि उसके पीछे अन्धकार छिपा है।
इस अबूझ राह पर एक और अनजान राही चल पड़ा है और यह गीत गुनगुना रहा है। फैज़ की शायरी पढ़ रहा है ,"चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। "
चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। मंजिल भी कहाँ आती है ; यह राही तो दूसरी मंजिल ढूंढ चल पड़ता है। जिसे चलने से प्रेम हो उसे मंजिल से नहीं राह से लगाव होता है।
अनजान राह के तन्हा राही का सलाम!
इस अबूझ राह पर एक और अनजान राही चल पड़ा है और यह गीत गुनगुना रहा है। फैज़ की शायरी पढ़ रहा है ,"चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। "
चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। मंजिल भी कहाँ आती है ; यह राही तो दूसरी मंजिल ढूंढ चल पड़ता है। जिसे चलने से प्रेम हो उसे मंजिल से नहीं राह से लगाव होता है।
अनजान राह के तन्हा राही का सलाम!
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Sunday, July 6, 2014
स्थिर बुद्धि की आवश्यकता
दुःखेष्वनुद्विग्मनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2/56 (गीता)
भावार्थ: जो दुःख में विचलित न हो तथा सुख में प्रसन्न नहीं होता , जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य ही मुनि कहलाता है।
ईश्वर कहते हैं कि मुनि अर्थात मनुष्य जीवन की सर्वोच्च अवस्था केवल उसे ही प्राप्त होती है जो सुख दुःख में सम भाव तथा आसक्ति, भय एवं क्रोध से स्वयं को मुक्त रखता है। मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों में से एक लक्ष्य इस स्थिर बुद्धि को प्राप्त करना भी है। एकाँकी जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था वह है जहाँ हम स्थिर बुद्धि हो सभी प्रकार के विघ्नों क़ा सामना करते हैं। जीवन में आशा एवं निराशा दोनों भाव हनिकारक हैँ। केवल कर्म भाव ही एक मात्र सत्य है तथा उसपर स्वयं का आधिकार भी श्रीभगवान गीता में देते हैं। कर्मफल के ऊपर हमारा कोई भी अधिकार नहीं है; यह महत्त्वपूर्ण शिक्षा आज भी उतनी ही आवश्यक है जितनी गीता के समय प्रासंगिक थी।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2/57 (गीता)
भावार्थ: इस भौतिक जगत में जो व्यक्ति न तो शुभ की प्राप्ति से हर्षित होता है और न ही दुःख के प्राप्त होने पर उससे घृणा करता हैं, वह पूर्ण ज्ञान में स्थिर होता है।
समस्त ज्ञान इस बात में ही है क़ि सुख एवम दुःख समभाव हैं तथा प्रज्ञा अर्थात बुद्धि के लिए यह समझना आवश्यक है। इस ज्ञान को समझे बिना मनुष्य के लिए जीवन यापन सदा ही एक समस्या रहेगा।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। 2/62 (गीता)
भावार्थ: विषयोंका निरंतर चिंतन करनेवाले पुरुषकी विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे उन विषयोंकी कामना उत्पन्न होती है और कामनामें (विघ्न पडनेसे) क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2/63 (गीता)
भावार्थ: क्रोधसे संमोह (मूढभाव) उत्पन्न होता है, संमोहसे स्मृतिभ्रम होता है (भान भूलना), स्मृतिभ्रम से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश होता है, और बुद्धिनाश होने से सर्वनाश हो जाता है।
बुद्धि की समाप्ति के साथ ही मनुष्य की चेतना का नाश हो जाता है तथा इसके साथ ही मनुष्य एक न समाप्त होने वाले गर्त में गिर जाता है तथा अंततः स्वयं को समाप्त कर लेता है।
मनुष्य का सर्वोच्च कर्म यह है कि वह स्थिर बुद्धि से कार्य करे एवं आगे बढ़े; इस प्रकार भगवत इच्छा के अनुरूप जीवन सरलता एवँ सुगमता से चलता है।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2/56 (गीता)
भावार्थ: जो दुःख में विचलित न हो तथा सुख में प्रसन्न नहीं होता , जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य ही मुनि कहलाता है।
ईश्वर कहते हैं कि मुनि अर्थात मनुष्य जीवन की सर्वोच्च अवस्था केवल उसे ही प्राप्त होती है जो सुख दुःख में सम भाव तथा आसक्ति, भय एवं क्रोध से स्वयं को मुक्त रखता है। मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों में से एक लक्ष्य इस स्थिर बुद्धि को प्राप्त करना भी है। एकाँकी जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था वह है जहाँ हम स्थिर बुद्धि हो सभी प्रकार के विघ्नों क़ा सामना करते हैं। जीवन में आशा एवं निराशा दोनों भाव हनिकारक हैँ। केवल कर्म भाव ही एक मात्र सत्य है तथा उसपर स्वयं का आधिकार भी श्रीभगवान गीता में देते हैं। कर्मफल के ऊपर हमारा कोई भी अधिकार नहीं है; यह महत्त्वपूर्ण शिक्षा आज भी उतनी ही आवश्यक है जितनी गीता के समय प्रासंगिक थी।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2/57 (गीता)
भावार्थ: इस भौतिक जगत में जो व्यक्ति न तो शुभ की प्राप्ति से हर्षित होता है और न ही दुःख के प्राप्त होने पर उससे घृणा करता हैं, वह पूर्ण ज्ञान में स्थिर होता है।
समस्त ज्ञान इस बात में ही है क़ि सुख एवम दुःख समभाव हैं तथा प्रज्ञा अर्थात बुद्धि के लिए यह समझना आवश्यक है। इस ज्ञान को समझे बिना मनुष्य के लिए जीवन यापन सदा ही एक समस्या रहेगा।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। 2/62 (गीता)
भावार्थ: विषयोंका निरंतर चिंतन करनेवाले पुरुषकी विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे उन विषयोंकी कामना उत्पन्न होती है और कामनामें (विघ्न पडनेसे) क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2/63 (गीता)
भावार्थ: क्रोधसे संमोह (मूढभाव) उत्पन्न होता है, संमोहसे स्मृतिभ्रम होता है (भान भूलना), स्मृतिभ्रम से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश होता है, और बुद्धिनाश होने से सर्वनाश हो जाता है।
बुद्धि की समाप्ति के साथ ही मनुष्य की चेतना का नाश हो जाता है तथा इसके साथ ही मनुष्य एक न समाप्त होने वाले गर्त में गिर जाता है तथा अंततः स्वयं को समाप्त कर लेता है।
मनुष्य का सर्वोच्च कर्म यह है कि वह स्थिर बुद्धि से कार्य करे एवं आगे बढ़े; इस प्रकार भगवत इच्छा के अनुरूप जीवन सरलता एवँ सुगमता से चलता है।
Saturday, March 8, 2014
हम दीवानों की क्या हस्ती/भगवतीचरण वर्मा
हम दीवानों की क्या हस्ती,
हम आज यहाँ कल वहां चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उडाते जहाँ चले
आए बनकर उल्लास अभी
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले?
किस ओर चले? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले।
दो बात कही, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोये,
छक कर सुख दुःख घूंटों को
हम एक भाव से पिए चले।
हम भिखमंगों की दुनिया में
स्वछंद लुटा कर प्यार चले,
हम एक निशानी सी उर पर,
ले असफलता का भार चले
हम मान रहित, अपमान रहित
जी भरकर खुलकर खेल चुके,
हम हँसते हँसते आज यहाँ
प्राणों की बाजी हार चले!
हम भला बुरा सब भूल चुके,
नतमस्तक हो मुख मोड़ चले,
अभिशाप उठाकर होठों पर
वरदान दृगों से छोड़ चले
अब अपना और पराया क्या?
आबाद रहे रुकने वाले!
हम स्वयं बंधे थे,
और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले!
हम आज यहाँ कल वहां चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उडाते जहाँ चले
आए बनकर उल्लास अभी
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले?
किस ओर चले? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले।
दो बात कही, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोये,
छक कर सुख दुःख घूंटों को
हम एक भाव से पिए चले।
हम भिखमंगों की दुनिया में
स्वछंद लुटा कर प्यार चले,
हम एक निशानी सी उर पर,
ले असफलता का भार चले
हम मान रहित, अपमान रहित
जी भरकर खुलकर खेल चुके,
हम हँसते हँसते आज यहाँ
प्राणों की बाजी हार चले!
हम भला बुरा सब भूल चुके,
नतमस्तक हो मुख मोड़ चले,
अभिशाप उठाकर होठों पर
वरदान दृगों से छोड़ चले
अब अपना और पराया क्या?
आबाद रहे रुकने वाले!
हम स्वयं बंधे थे,
और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले!
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Thursday, December 19, 2013
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
आज अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खान की पुण्य तिथि है। उनकी पुण्य तिथि पर मैं राम प्रसाद बिस्मिल की लिखी कविता जो लहू में उबाल ला देती है; उसे पेश कर रहा हूँ:
हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को
जीते जी हमने छुडाया उसी कशाने को
क्या न था और बहाना कोई तडपाने को
आस्मां क्या यही बाक़ी था सितम ढाने को
लाके ग़ुरबत में जो रक्खा हमें तरसाने को
फिर न गुलशन में हमें लाएगा सैयाद कभी
याद आएगा किसे यह दिल-ए-नाशाद कभी
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फ़रियाद कभी
हम भी इस बाग़ में थे क़ैद से आज़ाद कभी
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को
दिल फ़िदा करते हैं क़ुरबान जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खाना वीरान कहां देखिए घर करते हैं
ख़ुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को
न मयस्सर हुआ राहत से कभी मेल हमें
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें
एक दिन का भी न मंज़ूर हुआ बेल हमें
याद आएगा अलीपुर का बहुत जेल हमें
लोग तो भूल गये होंगे उस अफ़साने को
अंडमान ख़ाक तेरी क्यों न हो दिल में नाज़ा
छूके चरणों को जो पिंगले के हुई है जीशां
मरतबा इतना बढ़े तेरी भी तक़दीर कहां
आते आते जो रहे ‘बॉल तिलक‘ भी मेहमां
‘मांडले' को ही यह एज़ाज़ मिला पाने को
बात तो जब है कि इस बात की ज़िदे ठानें
देश के वास्ते क़ुरबान करें हम जानें
लाख समझाए कोई, उसकी न हरगिज़ मानें
बहते हुए ख़ून में अपना न गरेबां सानें
नासेह, आग लगे इस तेरे समझाने को
अपनी क़िस्मत में अज़ल से ही सितम रक्खा था
रंज रक्खा था, मेहन रक्खा था, ग़म रक्खा था
किसको परवाह थी और किसमे ये दम रक्खा था
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हम भी मां बाप के पाले थे, बड़े दुःख सह कर
वक़्त-ए-रुख्ह्सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आंसू जो टपके कभी रूख़ से बह कर
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को
देश-सेवा का ही बहता है लहू नस-नस में
हम तो खा बैठे हैं चित्तौड के गढ की क़समें
सरफरोशी की अदा होती हैं यों ही रसमें
भाल-ए-खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में
बहनो, तैयार चिताओं में हो जल जाने को
अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली
एक होती है फक़ीरों की हमेशा बोली
ख़ून में फाग रचाएगी हमारी टोली
जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को
अपना कुछ ग़म नहीं पर हमको ख़याल आता है
मादर-ए-हिंद पर कब तक जवाल आता है
‘हरादयाल‘ आता है ‘यरोप‘ से न ‘लाल‘ आता है
देश के हाल पे रह रह के मलाल आता है
मुन्तजिर रहते हैं हम ख़ाक में मिल जाने को
नौजवानों, जो तबीयत में तुम्हारी ख़टके
याद कर लेना हमें भी कभी भूले-भटके
आप के जुज़वे बदन होवे जुदा कट-कट के
और सद चाक हो माता का कलेजा फटके
पर न माथे पे शिकन आए क़सम खाने को
देखें कब तक ये असिरान-ए-मुसीबत छूटें
मादर-ए-हिंद के कब भाग खुलें या फूटें
‘गाँधी अफ़्रीका की बाज़ारों में सडकें कूटें
और हम चैन से दिन रात बहारें लूटें
क्यों न तरजीह दें इस जीने पे मर जाने को
कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी
ज़िंदगी भर को हमें भेज के काले पानी
मुंह में जल्लाद हुए जाते हैं छाले पानी
आब-ए-खंजर का पिला करके दुआ ले पानी
भरने क्यों जायें कहीं उम्र के पैमाने को
मैक़दा किसका है ये जाम-ए-सुबू किसका है
वार किसका है जवानों ये गुलू किसका है
जो बहे क़ौम के खातिर वो लहू किसका है
आस्मां सॉफ बता दे तू अदू किसका है
क्यों नये रंग बदलता है तू तड्पाने को
दर्दमन्दों से मुसीबत की हलावत पूछो
मरने वालों से ज़रा लुत्फ़-ए-शहादत पूछो
चश्म-ए-गुस्ताख से कुछ दीद की हसरत पूछो
कुश्त-ए-नाज़ से ठोकर की क़यामत पूछो
सोज़ कहते हैं किसे पूछ लो परवाने को
नौजवानों यही मौक़ा है उठो खुल खेलो
और सर पर जो बला आए ख़ुशी से झेलो
क़ौम के नाम पे सदक़े पे जवानी दे दो
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएं ले लो
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने को
हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को
जीते जी हमने छुडाया उसी कशाने को
क्या न था और बहाना कोई तडपाने को
आस्मां क्या यही बाक़ी था सितम ढाने को
लाके ग़ुरबत में जो रक्खा हमें तरसाने को
फिर न गुलशन में हमें लाएगा सैयाद कभी
याद आएगा किसे यह दिल-ए-नाशाद कभी
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फ़रियाद कभी
हम भी इस बाग़ में थे क़ैद से आज़ाद कभी
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को
दिल फ़िदा करते हैं क़ुरबान जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खाना वीरान कहां देखिए घर करते हैं
ख़ुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को
न मयस्सर हुआ राहत से कभी मेल हमें
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें
एक दिन का भी न मंज़ूर हुआ बेल हमें
याद आएगा अलीपुर का बहुत जेल हमें
लोग तो भूल गये होंगे उस अफ़साने को
अंडमान ख़ाक तेरी क्यों न हो दिल में नाज़ा
छूके चरणों को जो पिंगले के हुई है जीशां
मरतबा इतना बढ़े तेरी भी तक़दीर कहां
आते आते जो रहे ‘बॉल तिलक‘ भी मेहमां
‘मांडले' को ही यह एज़ाज़ मिला पाने को
बात तो जब है कि इस बात की ज़िदे ठानें
देश के वास्ते क़ुरबान करें हम जानें
लाख समझाए कोई, उसकी न हरगिज़ मानें
बहते हुए ख़ून में अपना न गरेबां सानें
नासेह, आग लगे इस तेरे समझाने को
अपनी क़िस्मत में अज़ल से ही सितम रक्खा था
रंज रक्खा था, मेहन रक्खा था, ग़म रक्खा था
किसको परवाह थी और किसमे ये दम रक्खा था
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हम भी मां बाप के पाले थे, बड़े दुःख सह कर
वक़्त-ए-रुख्ह्सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आंसू जो टपके कभी रूख़ से बह कर
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को
देश-सेवा का ही बहता है लहू नस-नस में
हम तो खा बैठे हैं चित्तौड के गढ की क़समें
सरफरोशी की अदा होती हैं यों ही रसमें
भाल-ए-खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में
बहनो, तैयार चिताओं में हो जल जाने को
अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली
एक होती है फक़ीरों की हमेशा बोली
ख़ून में फाग रचाएगी हमारी टोली
जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को
अपना कुछ ग़म नहीं पर हमको ख़याल आता है
मादर-ए-हिंद पर कब तक जवाल आता है
‘हरादयाल‘ आता है ‘यरोप‘ से न ‘लाल‘ आता है
देश के हाल पे रह रह के मलाल आता है
मुन्तजिर रहते हैं हम ख़ाक में मिल जाने को
नौजवानों, जो तबीयत में तुम्हारी ख़टके
याद कर लेना हमें भी कभी भूले-भटके
आप के जुज़वे बदन होवे जुदा कट-कट के
और सद चाक हो माता का कलेजा फटके
पर न माथे पे शिकन आए क़सम खाने को
देखें कब तक ये असिरान-ए-मुसीबत छूटें
मादर-ए-हिंद के कब भाग खुलें या फूटें
‘गाँधी अफ़्रीका की बाज़ारों में सडकें कूटें
और हम चैन से दिन रात बहारें लूटें
क्यों न तरजीह दें इस जीने पे मर जाने को
कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी
ज़िंदगी भर को हमें भेज के काले पानी
मुंह में जल्लाद हुए जाते हैं छाले पानी
आब-ए-खंजर का पिला करके दुआ ले पानी
भरने क्यों जायें कहीं उम्र के पैमाने को
मैक़दा किसका है ये जाम-ए-सुबू किसका है
वार किसका है जवानों ये गुलू किसका है
जो बहे क़ौम के खातिर वो लहू किसका है
आस्मां सॉफ बता दे तू अदू किसका है
क्यों नये रंग बदलता है तू तड्पाने को
दर्दमन्दों से मुसीबत की हलावत पूछो
मरने वालों से ज़रा लुत्फ़-ए-शहादत पूछो
चश्म-ए-गुस्ताख से कुछ दीद की हसरत पूछो
कुश्त-ए-नाज़ से ठोकर की क़यामत पूछो
सोज़ कहते हैं किसे पूछ लो परवाने को
नौजवानों यही मौक़ा है उठो खुल खेलो
और सर पर जो बला आए ख़ुशी से झेलो
क़ौम के नाम पे सदक़े पे जवानी दे दो
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएं ले लो
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने को
Saturday, January 14, 2012
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.
एक देश है, हजारों भाषा,
हजारों जाति और अनेक धर्म.
उबलता है देश सारा, के भारत नहीं है हमारा.
उबलते हैं सभी धर्म, के भारत नहीं है हमारा.
एक धर्म है हमारा, जो रखे देश को एक,
इस देश के भ्रष्ट लोग न पूछे कोई जाति,
बस हाथ फैलाकर करते स्वागत, हो कोई भी धर्म,
हमको पैसा देदो भाई, भले हो आपका कोई भी मर्म.
भारत एक है जब सामने आवे भ्रष्टाचार,
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी एक साथ करें गुणगान,
हमारे सपने को भी कभी मिलेगा आकार,
बने भारत का एक नया ही राष्ट्रगान,
"भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं,
कई धर्म हैं कई भाषा, होती हैं कई जाति भी,
एकता और अखंडता को एकजुट रखने में हम सब एक हैं,
जब तक जेब में आते नोट, भारत एक है.
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं."----रविन्द्र
एक देश है, हजारों भाषा,
हजारों जाति और अनेक धर्म.
उबलता है देश सारा, के भारत नहीं है हमारा.
उबलते हैं सभी धर्म, के भारत नहीं है हमारा.
एक धर्म है हमारा, जो रखे देश को एक,
इस देश के भ्रष्ट लोग न पूछे कोई जाति,
बस हाथ फैलाकर करते स्वागत, हो कोई भी धर्म,
हमको पैसा देदो भाई, भले हो आपका कोई भी मर्म.
भारत एक है जब सामने आवे भ्रष्टाचार,
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी एक साथ करें गुणगान,
हमारे सपने को भी कभी मिलेगा आकार,
बने भारत का एक नया ही राष्ट्रगान,
"भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं,
कई धर्म हैं कई भाषा, होती हैं कई जाति भी,
एकता और अखंडता को एकजुट रखने में हम सब एक हैं,
जब तक जेब में आते नोट, भारत एक है.
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं."----रविन्द्र
Sunday, January 8, 2012
तू गान प्रेम का गाता चल,
लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सिसकियों और चित्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों का हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।
आशा के स्वर का भार, पवन को लेकिन , लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।
रंगो के सातों घट उँड़ेल, यह अँधियारी रँग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।
आदर्शों से आदर्श भिड़े, प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है, धरती की किस्मत फूट रही।
आवर्तों का है विषम जाल, निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई सभ्यता डूबने जाती है।
जब-जब मस्तिष्क जयी होता, संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय, तू यह संवाद सुनाता चल।
सूरज है जग का बुझा-बुझा, चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई, आलोक न इनका जगता है,
इन मलिन ग्रहों के प्राणों में कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर घिसकर इनको ताजा कर दे।
दीपक के जलते प्राण, दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को अपनी अस्थियाँ जलाता चल।
क्या उन्हें देख विस्मित होना, जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे सोने-चाँदी के तारों में ?
मानवता का तू विप्र, गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल जलने भर का अधिकारी है।
ले बड़ी खुशी से उठा, सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल, मगर उस का भी मोल चुकाता चल।
काया की कितनी धूम-धाम! दो रोज चमक बुझ जाती है;
छाया पीती पीयुष, मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है ।
लेने दे जग को उसे, ताल पर जो कलहंस मचलता है,
तेरा मराल जल के दर्पण में नीचे-नीचे चलता है।
कनकाभ धूल झर जाएगी, वे रंग कभी उड़ जाएँगे,
सौरभ है केवल सार, उसे तू सब के लिए जुगाता चल।
क्या अपनी उन से होड़, अमरता की जिनको पहचान नहीं,
छाया से परिचय नहीं, गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं?
जो चतुर चाँद का रस निचोड़ प्यालों में ढाला करते हैं,
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से जो इत्र निकाला करते हैं।
ये भी जाएँगे कभी, मगर, आधी मनुष्यतावालों पर,
जैसे मुसकाता आया है, वैसे अब भी मुसकाता चल।
सभ्यता-अंग पर क्षत कराल, यह अर्थ-मानवों का बल है,
हम रोकर भरते उसे, हमारी आँखों में गंगाजल है।
शूली पर चढा मसीहा को वे फूले नहीं समाते हैं
हम शव को जीवित करने को छायापुर में ले जाते हैं।
भींगी चाँदनियों में जीता, जो कठिन धूप में मरता है,
उजियाली से पीड़ित नर के मन में गोधूलि बसाता चल।
यह देख नयी लीला उन की, फिर उन ने बड़ा कमाल किया,
गाँधी के लोहू से सारे, भारत-सागर को लाल किया।
जो उठे राम, जो उठे कृष्ण, भारत की मिट्टी रोती है,
क्य हुआ कि प्यारे गाँधी की यह लाश न जिन्दा होती है?
तलवार मारती जिन्हें, बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती,
जीवनी-शक्ति के अभिमानी! यह भी कमाल दिखलाता चल।
धरती के भाग हरे होंगे, भारती अमृत बरसाएगी,
दिन की कराल दाहकता पर चाँदनी सुशीतल छाएगी।
ज्वालामुखियों के कण्ठों में कलकण्ठी का आसन होगा,
जलदों से लदा गगन होगा, फूलों से भरा भुवन होगा।
बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी, मूर्तियाँ एक दिन बोलेंगी,
मुँह खोल-खोल सब के भीतर शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सिसकियों और चित्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों का हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।
आशा के स्वर का भार, पवन को लेकिन , लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।
रंगो के सातों घट उँड़ेल, यह अँधियारी रँग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।
आदर्शों से आदर्श भिड़े, प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है, धरती की किस्मत फूट रही।
आवर्तों का है विषम जाल, निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई सभ्यता डूबने जाती है।
जब-जब मस्तिष्क जयी होता, संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय, तू यह संवाद सुनाता चल।
सूरज है जग का बुझा-बुझा, चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई, आलोक न इनका जगता है,
इन मलिन ग्रहों के प्राणों में कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर घिसकर इनको ताजा कर दे।
दीपक के जलते प्राण, दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को अपनी अस्थियाँ जलाता चल।
क्या उन्हें देख विस्मित होना, जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे सोने-चाँदी के तारों में ?
मानवता का तू विप्र, गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल जलने भर का अधिकारी है।
ले बड़ी खुशी से उठा, सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल, मगर उस का भी मोल चुकाता चल।
काया की कितनी धूम-धाम! दो रोज चमक बुझ जाती है;
छाया पीती पीयुष, मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है ।
लेने दे जग को उसे, ताल पर जो कलहंस मचलता है,
तेरा मराल जल के दर्पण में नीचे-नीचे चलता है।
कनकाभ धूल झर जाएगी, वे रंग कभी उड़ जाएँगे,
सौरभ है केवल सार, उसे तू सब के लिए जुगाता चल।
क्या अपनी उन से होड़, अमरता की जिनको पहचान नहीं,
छाया से परिचय नहीं, गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं?
जो चतुर चाँद का रस निचोड़ प्यालों में ढाला करते हैं,
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से जो इत्र निकाला करते हैं।
ये भी जाएँगे कभी, मगर, आधी मनुष्यतावालों पर,
जैसे मुसकाता आया है, वैसे अब भी मुसकाता चल।
सभ्यता-अंग पर क्षत कराल, यह अर्थ-मानवों का बल है,
हम रोकर भरते उसे, हमारी आँखों में गंगाजल है।
शूली पर चढा मसीहा को वे फूले नहीं समाते हैं
हम शव को जीवित करने को छायापुर में ले जाते हैं।
भींगी चाँदनियों में जीता, जो कठिन धूप में मरता है,
उजियाली से पीड़ित नर के मन में गोधूलि बसाता चल।
यह देख नयी लीला उन की, फिर उन ने बड़ा कमाल किया,
गाँधी के लोहू से सारे, भारत-सागर को लाल किया।
जो उठे राम, जो उठे कृष्ण, भारत की मिट्टी रोती है,
क्य हुआ कि प्यारे गाँधी की यह लाश न जिन्दा होती है?
तलवार मारती जिन्हें, बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती,
जीवनी-शक्ति के अभिमानी! यह भी कमाल दिखलाता चल।
धरती के भाग हरे होंगे, भारती अमृत बरसाएगी,
दिन की कराल दाहकता पर चाँदनी सुशीतल छाएगी।
ज्वालामुखियों के कण्ठों में कलकण्ठी का आसन होगा,
जलदों से लदा गगन होगा, फूलों से भरा भुवन होगा।
बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी, मूर्तियाँ एक दिन बोलेंगी,
मुँह खोल-खोल सब के भीतर शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
Saturday, January 7, 2012
तलाश
इक आह सी दिल में उठती है, इक दर्द जिगर में उठता है,
हम रात में उठके रोते हैं, जब सारा ज़माना सोता है.
ये मेरा जीवन है, जो जाने मुझ से क्या चाहता है.
हम रात में उठके रोते हैं, जब सारा ज़माना सोता है.
ये मेरा जीवन है, जो जाने मुझ से क्या चाहता है.
दिन होता है तो कुछ और तलाश होती है, रात होती है तो कुछ और तलाश होती है.
जब चलते हैं तो इक मंजिल की और मंजिल पे किसी राह की तलाश होती है.
करना क्या चाहते हैं ये तो पता नहीं, पर जाने किस पते की तलाश होती है.
चलते चलते जो मिले रह गुज़र, तो रास्ता ठीक से निकल गया,
वरना तो रास्ते में हर रोज इक रह गुजर की तलाश होती है.
तलाश करते करते ये जिंदगी इक तलाश बन गयी है, पर फिर भी इस तलाश में इक जिंदगी की तलाश होती है.
इक अजीब सी उलझन में फंसी है जिंदगानी, पर इस उलझन में भी एक रास्ते की तलाश होती है.
इक रब के दीदार से ये तलाश कहाँ पूरी हुई, जो इक रब के बाद दूसरे रब की तलाश होती है.
रविन्द्र सिंह ढुल/ ०७.०१.२०१२/जींद
Tuesday, December 27, 2011
पास खडा था भ्रष्टाचार
सुबह उठ कर आँख खुली तो पास खडा था भ्रष्टाचार,
अट्टहास लगाता हुआ, प्रश्न चिह्न लगाता हुआ.
जब पूछा मैंने, तुझमें इतने प्राण कहाँ से आये,
के तुम बिन पूछे, बिन बताए मेरे घर भी दौड़ आये.
हंसता हुआ, वो बोला, तुम शायद अवगत नहीं,
कल रात ही संसद में मुझे जीवनदान मिला है.
देश शायद सो रहा था, दिवा स्वप्न के बीज अपने घर में बो रहा था,
इतने में एक कानून आया, जिसने भ्रष्टाचार को मिटाने का संकल्प दोहराया.
बस उस कानून से मुझे जीवन दान मिला है,
अब तक तो मैं सिर्फ घर के बाहर सड़क पर, दफ्तरों में पाया जाता था,
अब मैं घर में, आपके साथ खड़ा,
अट्टहास करूँगा, आपकी बेचैनी पर,
मेरा जीवन हरण करने चला था जो चौकीदार,
उसे ही रिश्वत से मैंने अपने साथ मिला लिया......रविन्द्र सिंह ढुल/२८.१२.२०११
शहीदों की चिताओं पर/जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’
उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा
चखाएँगे मज़ा बर्बादिए गुलशन का गुलचीं को
बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा
ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजरे क़ातिल
पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़
न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा
वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है
सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा
कभी वह दिन भी आयेगा जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी जब अपना आसमां होगा......
Saturday, December 24, 2011
धर्मनिरपेक्षता
रूचीनां वैचित्र्य अदृजुकुटिलनानापथजुषां.
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसमर्णाव इव. (शिव महिम्नः स्तोत्र, ७ )
अर्थात हे शिव, जिस प्रकार विभिन्न नदियाँ विभिन्न पर्वतों से निकलकर सरल तथा वक्र गति से प्रवाहित होती हुई अंततः समुद्र में ही मिल जाती है, उसी प्रकार अपनी विभिन्न प्रवृतियों के कारण जिन विभिन्न मार्गों को लोग ग्रहण करते हैं, सरल या वक्र रूप में विभिन्न लगने पर भी वे सभी लोग तुम तक ही पंहुचते हैं.
उपरोक्त श्लोक हिन्दू धर्म के सिद्धांत "सर्व धर्म समभाव" को प्रदर्शित करने वाला एक बेहद शानदार श्लोक है. यह आंग्लभाषा के शब्द "secularism" से बिल्कुल. अलग है. आज कल धर्मनिरपेक्षता को अलग अलग तरह से परिभाषित करने की होड़ सी लगी है. मैं इस परिभाषा को राजनैतिक न बनाते हुए सीधे सीधे परिभाषित करने का प्रयास करता हूँ, जैसा कि हिन्दू धर्म में किया गया है. इस सिद्धांत को शब्द कोष के द्वारा परिभाषित करना बेहद आसान पर विचारों में समायोजन करना उतना ही कठिन एवं दुरूह कार्य है. धर्मनिरपेक्षता अर्थात किसी धर्म विशेष के लिए अपनी अपेक्षा न रखना, यह है इसका सीधा साधा शब्दकोष का अर्थ. पर यह लिया जाता है किसी और रूप में. इसे परिभाषित किया जाता है अपने अपने तरीके से एवं अपने अपने दृष्टिकोण से. गीता में कृष्ण कहते हैं"हे अर्जुन! जग में जहां जहां भी अच्छा कार्य होता है, धर्म का कार्य होता है, वहां मैं पाया जाता हूँ" तो प्रभु ने धर्मनिरपेक्षता को आयाम देते हुए कहा कि इसका अर्थ है सभी प्रकार की धार्मिक विचारधारा को सम्मान देना. तो आप सीधे सीधे देख सकते हैं फर्क दोनों विचारधाराओं में. एक कहती है किसी धार्मिक विचार को तवज्जो न दो, दूसरी कहती है सभी धर्मों को एक नजर से देखो और उनके विचारों का भी सम्मान करो.
उपरोक्त का सीधा सीधा मतलब निकालें तो वह यह होगा कि यदि किसी जगह पर किसी दुसरे धर्म से कोई सही विचार ग्रहण कर सकते हैं तो हम सही मायने में धर्म निरपेक्ष होंगे. अपने या दूसरों के धर्म या उनकी मान्यताओं को अधिक तवज्जो देने की आवश्यकता नहीं है. बस अपने विचार पर अडिग रहिये, यदि वह विचार सही है, वह मान्यता सही है तो बच जायेगी, वरना समाप्त हो जायेगी. चाहे शिव महिम्नः स्तोत्र हो या गीता, एक ही विचार दिखेगा कि लक्ष्य एक प्रभु तक पंहुचने का है, रास्ता चाहे कोई भी हो, पंहुचेगा एक ही जगह. तो हमारा विचार किसी और के विचार से श्रेष्ट कैसे हुआ? यदि अपने विचार को श्रेष्ट बनाना है तो अपनी विचारधारा को समृद्ध बनाना भी हमारा काम है. हिन्दू धर्म सहिष्णु है, यही हमारी विचारधारा है. यही एक कारण है जो स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार हमारी संस्कृति के जीवित रहने का कारण है. क्या कारण है ग्रीक, मिस्र या मेसोपोटामिया के लोग समाप्त हो गए, या मंगोल समाप्त हो गए? हम बचे हैं हमारे दृढ विचार धारा के कारण जो हमें यह सिखाती है "उदार चरितानाम वसुधैव कुटुम्बकम" अर्थात उदार चरित वालों के लिए तो सारी धरती एक कुटुंब के समान है.
अतः अपनी धर्मनिरपेक्षता को नया आयाम दीजिये, इसे धर्म के प्रति उदासीनता नहीं, वरना धर्म के प्रति जागरूकता बनाइये. निकाल फैंकिए ऐसे किसी भी विचार को जो संकीर्ण बनाता है आपकी मानसिकता को या आपको विनाश की और लेकर जाता है. माँ भारती आपके मार्ग को प्रशस्त करे.
रविन्द्र सिंह ढुल/२४.१२.२०११
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसमर्णाव इव. (शिव महिम्नः स्तोत्र, ७ )
अर्थात हे शिव, जिस प्रकार विभिन्न नदियाँ विभिन्न पर्वतों से निकलकर सरल तथा वक्र गति से प्रवाहित होती हुई अंततः समुद्र में ही मिल जाती है, उसी प्रकार अपनी विभिन्न प्रवृतियों के कारण जिन विभिन्न मार्गों को लोग ग्रहण करते हैं, सरल या वक्र रूप में विभिन्न लगने पर भी वे सभी लोग तुम तक ही पंहुचते हैं.
उपरोक्त श्लोक हिन्दू धर्म के सिद्धांत "सर्व धर्म समभाव" को प्रदर्शित करने वाला एक बेहद शानदार श्लोक है. यह आंग्लभाषा के शब्द "secularism" से बिल्कुल. अलग है. आज कल धर्मनिरपेक्षता को अलग अलग तरह से परिभाषित करने की होड़ सी लगी है. मैं इस परिभाषा को राजनैतिक न बनाते हुए सीधे सीधे परिभाषित करने का प्रयास करता हूँ, जैसा कि हिन्दू धर्म में किया गया है. इस सिद्धांत को शब्द कोष के द्वारा परिभाषित करना बेहद आसान पर विचारों में समायोजन करना उतना ही कठिन एवं दुरूह कार्य है. धर्मनिरपेक्षता अर्थात किसी धर्म विशेष के लिए अपनी अपेक्षा न रखना, यह है इसका सीधा साधा शब्दकोष का अर्थ. पर यह लिया जाता है किसी और रूप में. इसे परिभाषित किया जाता है अपने अपने तरीके से एवं अपने अपने दृष्टिकोण से. गीता में कृष्ण कहते हैं"हे अर्जुन! जग में जहां जहां भी अच्छा कार्य होता है, धर्म का कार्य होता है, वहां मैं पाया जाता हूँ" तो प्रभु ने धर्मनिरपेक्षता को आयाम देते हुए कहा कि इसका अर्थ है सभी प्रकार की धार्मिक विचारधारा को सम्मान देना. तो आप सीधे सीधे देख सकते हैं फर्क दोनों विचारधाराओं में. एक कहती है किसी धार्मिक विचार को तवज्जो न दो, दूसरी कहती है सभी धर्मों को एक नजर से देखो और उनके विचारों का भी सम्मान करो.
उपरोक्त का सीधा सीधा मतलब निकालें तो वह यह होगा कि यदि किसी जगह पर किसी दुसरे धर्म से कोई सही विचार ग्रहण कर सकते हैं तो हम सही मायने में धर्म निरपेक्ष होंगे. अपने या दूसरों के धर्म या उनकी मान्यताओं को अधिक तवज्जो देने की आवश्यकता नहीं है. बस अपने विचार पर अडिग रहिये, यदि वह विचार सही है, वह मान्यता सही है तो बच जायेगी, वरना समाप्त हो जायेगी. चाहे शिव महिम्नः स्तोत्र हो या गीता, एक ही विचार दिखेगा कि लक्ष्य एक प्रभु तक पंहुचने का है, रास्ता चाहे कोई भी हो, पंहुचेगा एक ही जगह. तो हमारा विचार किसी और के विचार से श्रेष्ट कैसे हुआ? यदि अपने विचार को श्रेष्ट बनाना है तो अपनी विचारधारा को समृद्ध बनाना भी हमारा काम है. हिन्दू धर्म सहिष्णु है, यही हमारी विचारधारा है. यही एक कारण है जो स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार हमारी संस्कृति के जीवित रहने का कारण है. क्या कारण है ग्रीक, मिस्र या मेसोपोटामिया के लोग समाप्त हो गए, या मंगोल समाप्त हो गए? हम बचे हैं हमारे दृढ विचार धारा के कारण जो हमें यह सिखाती है "उदार चरितानाम वसुधैव कुटुम्बकम" अर्थात उदार चरित वालों के लिए तो सारी धरती एक कुटुंब के समान है.
अतः अपनी धर्मनिरपेक्षता को नया आयाम दीजिये, इसे धर्म के प्रति उदासीनता नहीं, वरना धर्म के प्रति जागरूकता बनाइये. निकाल फैंकिए ऐसे किसी भी विचार को जो संकीर्ण बनाता है आपकी मानसिकता को या आपको विनाश की और लेकर जाता है. माँ भारती आपके मार्ग को प्रशस्त करे.
रविन्द्र सिंह ढुल/२४.१२.२०११
सच हम नहीं सच तुम नहीं
सच हम नहीं सच तुम नहीं
सच है सतत संघर्ष ही ।
संघर्ष से हट कर जिए तो क्या जिए हम या कि तुम।
जो नत हुआ वह मृत हुआ ज्यों वृन्त से झर कर कुसुम।
जो पंथ भूल रुका नहीं,
जो हार देखा झुका नहीं,
जिसने मरण को भी लिया हो जीत, है जीवन वही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
ऐसा करो जिससे न प्राणों में कहीं जड़ता रहे।
जो है जहाँ चुपचाप अपने आपसे लड़ता रहे।
जो भी परिस्थितियाँ मिलें,
काँटें चुभें, कलियाँ खिलें,
टूटे नहीं इन्सान, बस सन्देश यौवन का यही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
हमने रचा आओ हमीं अब तोड़ दें इस प्यार को।
यह क्या मिलन, मिलना वही जो मोड़ दे मँझधार को।
जो साथ कूलों के चले,
जो ढाल पाते ही ढले,
यह ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी जो सिर्फ़ पानी-सी बही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
अपने हृदय का सत्य अपने आप हमको खोजना।
अपने नयन का नीर अपने आप हमको पोंछना।
आकाश सुख देगा नहीं,
धरती पसीजी है कहीं,
हर एक राही को भटक कर ही दिशा मिलती रही
सच हम नहीं सच तुम नहीं।
बेकार है मुस्कान से ढकना हृदय की खिन्नता।
आदर्श हो सकती नहीं तन और मन की भिन्नता।
जब तक बंधी है चेतना,
जब तक प्रणय दुख से घना,
तब तक न मानूँगा कभी इस राह को ही मैं सही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।जगदीश गुप्त (Jagdish Gupt)
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उठो धरा के अमर सपूतो
उठो धरा के अमर सपूतो
पुनः नया निर्माण करो ।
जन-जन के जीवन में फिर से
नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ।
नया प्रात है, नई बात है,
नई किरण है, ज्योति नई ।
नई उमंगें, नई तरंगे,
नई आस है, साँस नई ।
युग-युग के मुरझे सुमनों में,
नई-नई मुसकान भरो ।
डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं ।
गुन-गुन-गुन-गुन करते भौंरे
मस्त हुए मँडराते हैं ।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नवगान भरो ।
कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है ।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है ।
नूतन मंगलमयी ध्वनियों से
गुंजित जग-उद्यान करो ।
सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है ।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है ।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो ।
उठो धरा के अमर सपूतो,
पुनः नया निर्माण करो ।द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
पुनः नया निर्माण करो ।
जन-जन के जीवन में फिर से
नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ।
नया प्रात है, नई बात है,
नई किरण है, ज्योति नई ।
नई उमंगें, नई तरंगे,
नई आस है, साँस नई ।
युग-युग के मुरझे सुमनों में,
नई-नई मुसकान भरो ।
डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं ।
गुन-गुन-गुन-गुन करते भौंरे
मस्त हुए मँडराते हैं ।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नवगान भरो ।
कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है ।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है ।
नूतन मंगलमयी ध्वनियों से
गुंजित जग-उद्यान करो ।
सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है ।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है ।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो ।
उठो धरा के अमर सपूतो,
पुनः नया निर्माण करो ।द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
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Friday, December 23, 2011
कानून की देवी तेरी जय जय कार
कानून की देवी तेरी जय जय कार,
छाया जब हर जगह अन्धकार,
राजा करता हो जनता पर अत्याचार,
ले हाथ में तराजू, जब उठाया तुमने यह बीड़ा,
हिल गयी सरकारें, पलट गए ताज.
कहती सरकारें, सीमा में नहीं कानून अब,
देवी करती सरकार पर अत्याचार,
पर पूछती है कलम मेरी इन सरकारों से,
क्यों छीना निवाला गरीब का, क्यों फैलाया भ्रष्टाचार.-रविन्द्र सिंह ढुल/दिनांक २३.१२.२०११
आग की भीख
धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।
मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।
मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।
- दिनकर
Sunday, December 18, 2011
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! -हरिवंश राय 'बच्चन'
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! -हरिवंश राय 'बच्चन'
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अब तो पथ यही है |
जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है|
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |(दुष्यंत कुमार)
अब तो पथ यही है|
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है|
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |(दुष्यंत कुमार)
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साथी, सब कुछ सहना होगा!
मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!–हरिवंश राय बच्चन
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!–हरिवंश राय बच्चन
पथ की पहचान
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।
पुस्तकों में है नहीं
छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की जबानी
छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की जबानी
अनगिनत राही गए
इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी
इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी
यह निशानी मूक होकर
भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।
भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।
यह बुरा है या कि अच्छा
व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना
व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना
तू इसे अच्छा समझ
यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना
यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना
हर सफल पंथी यही
विश्वास ले इस पर बढ़ा है
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
विश्वास ले इस पर बढ़ा है
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।
है अनिश्चित किस जगह पर
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे
किस जगह यात्रा खतम हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे
कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।-हरिवंश राय बच्चन
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