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Wednesday, October 22, 2014

ज्ञान असत्य है

समस्त ज्ञान असत्य है एवं समस्त सत्य ज्ञान का स्वरुप है। समस्त सांसारिक ज्ञान केवल मात्र तर्क की शक्ति पर टिका है एवं जब तक  वह तर्क की सीमा को पार नहीं कर देता उसे संसार ज्ञान की श्रेणी में नहीं रखता। श्री रामकृष्ण परमहँस कहते हैं कि ज्ञान विश्वास से पैदा होता है न कि तर्क से। प्रथम आपकी बुद्धि स्वीकार करेगी उस उस अनजान को उसके बाद ही ज्ञान पैदा होगा एवं जन्म लेगा। यदि बुद्धि स्वीकार करने की स्थिति में होगी ही नहीं तो ज्ञान आ ही नहीं सकता। साकार ब्रह्म अथवा निराकार ब्रह्म दोनों ही उस ज्ञान के स्वरूप हैं। श्री परमहँस भी उस ज्ञान से जन्म लेते हैं तथा श्री दयानंद भी। जहाँ एक ओर हजरत मोहम्मद उस ही ज्ञान से जन्म लेते हैं तो दूसरी ओर ओशो भी उस ज्ञान का स्वरुप मात्र है। यदि हम इन परस्पर विरोधाभासी महापुरुषों को एक तर्क की श्रेणी में रखेंगे तो हम समझ पाएंगे कि सभी का  ज्ञान अधूरा है। वहीँ दूसरी ओर यदि किसी एक के ऊपर दृढ विश्वास किया जाए तो सभी पूर्ण हैं। अतः स्पष्ट है कि विश्वास कीजिये  कि तर्क के परे झाँका जा सकता है। माँ भारती आप सबका मार्ग प्रशस्त करे।

रविन्द्र सिंह ढुल  

Friday, August 16, 2013

धर्म समन्वय के ऊपर स्वामी विवेकानंद जी के कुछ विचार

 "संसार के लिए यह बड़े ही दुर्भाग्य की  बात होगी यदि सभी मनुष्य एक ही धर्म, उपासना की एक ही पद्यति और नैतिकता के एक ही आदर्श को स्वीकार कर लें।  इससे सभी धार्मिक और आद्यात्मिक उन्नति को मृत्यु जैसा आघात पंहुचेगा।  "

दूसरे धर्म या मत के लिए हमें केवल सहनशीलता नहीं दिखानी है; बल्कि प्रत्यक्ष रूप से उन्हें स्वीकार करना होगा; और यही सत्य सब धर्मों की नींव है। "

"साधुता, पवित्रता और सेवा किसी सम्प्रदाय विशेष की संपत्ति नहीं है; और प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ट तथा अतिशय उन्नत चरित्र के नर-नारियों को जन्म दिया है।  इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्य सारे धर्म नष्ट हो जाएँ और केवल उसी का धर्म जीवित रहेगा, तो मैं अपने हृदय के अन्तस्तल से उस पर दया करता हूँ और उसे स्पष्ट बता देना चाहता हूँ कि सारे प्रतिरोधों के बावजूद, शीघ्र ही प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा होगा-संघर्ष नहीं सहयोग; पर भाव-विनाश नहीं पर भाव ग्रहण, मतभेद और कलह नहीं, समन्वय और शान्ति। "

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कल कुछ और विचार प्रस्तुत करूंगा।

Monday, June 24, 2013

विचार

कोई भी धर्म हिंसा, घृणा, वैर नहीं फैला सकता। यदि वह ऐसा करता है तो उस धर्म का प्रचारक पाखंडी एवं झूठा है। अब यह सोचने वाली बात है कि मैंने धर्म प्रचारकों को पाखंडी कहा; धर्म को नहीं।
धर्म मेरे किसी विचार से एवं किसी एक मनुष्य से कहीं महान हैं। धर्म चाहे कोई भी हो, पृथ्वी के किसी भी कोने में क्यों न हो, सच्चा होगा, धर्म को झूठा बताने वाला गलत हो सकता है पर धर्म नहीं। धर्म किसी भी व्यक्ति की आस्था का केंद्र है; उसका विशवास है; उसका चरित्र है; उसकी नैतिकता है। नैतिक जीवन जीने वाला किसी एक पाखंडी साधू से अधिक धार्मिक है जो जाप तो हर रोज करता है पर हृदय में श्रद्धा नहीं रखता।
संस्कृत में एक श्लोक है"यतो धर्मस्ततो जयः" अर्थात जहाँ धर्म है; वहीँ विजय है। मैं अपने आपको एक हिन्दू धर्म के साथ जुडा मानकर उस ईश का अपमान क्यों करून जिसने हमें उत्पन्न किया है; यदि मुझे मुस्लिम धर्म समर्पण करना सिखाता है; इसाई धर्म सामान्य नैतिकता सिखाता है; सिख धर्म सेवा सिखाता है तो केवल हिन्दू धर्म से शिक्षा ग्रहण करके मैं उन धर्मात्माओं का अपमान नहीं कर सकता जिन्होंने इन महान विचारधाराओं को प्रतिपादित किया है। हालांकि यह भी उतना ही सच है की वे लोग किसी भी मान या अपमान से परे हैं और  महान हैं कि मेरी प्रशंसा या मेरी आलोचना उन्हें छू भी न पाएगी।
कल कुछ और लिखूंगा; तब तक के लिए शुभ रात्रि-रविन्द्र

Saturday, December 24, 2011

धर्मनिरपेक्षता

रूचीनां वैचित्र्य अदृजुकुटिलनानापथजुषां.
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसमर्णाव इव. (शिव महिम्नः स्तोत्र, ७ )

अर्थात हे शिव, जिस प्रकार विभिन्न नदियाँ विभिन्न पर्वतों से निकलकर सरल तथा वक्र गति से प्रवाहित होती हुई अंततः समुद्र में ही मिल जाती है, उसी प्रकार अपनी विभिन्न प्रवृतियों के कारण जिन विभिन्न मार्गों को लोग ग्रहण करते हैं, सरल या वक्र रूप में विभिन्न लगने पर भी वे सभी लोग तुम तक ही पंहुचते हैं.

उपरोक्त श्लोक हिन्दू धर्म के सिद्धांत "सर्व धर्म समभाव" को प्रदर्शित करने वाला एक बेहद शानदार श्लोक है. यह आंग्लभाषा के शब्द "secularism" से बिल्कुल.  अलग है. आज कल धर्मनिरपेक्षता को अलग अलग तरह से परिभाषित करने की होड़ सी लगी है. मैं इस परिभाषा को राजनैतिक न बनाते हुए सीधे सीधे परिभाषित करने का प्रयास करता हूँ, जैसा कि हिन्दू धर्म में किया गया है. इस सिद्धांत को शब्द कोष के द्वारा परिभाषित करना बेहद आसान पर विचारों में समायोजन करना उतना ही कठिन एवं दुरूह कार्य है. धर्मनिरपेक्षता अर्थात किसी धर्म विशेष के लिए अपनी अपेक्षा न रखना, यह है इसका सीधा साधा शब्दकोष का अर्थ. पर यह लिया जाता है किसी और रूप में. इसे परिभाषित किया जाता है अपने अपने तरीके से एवं अपने अपने दृष्टिकोण से. गीता में कृष्ण कहते हैं"हे अर्जुन! जग में जहां जहां भी अच्छा कार्य होता है, धर्म का कार्य होता है, वहां मैं पाया जाता हूँ" तो प्रभु ने धर्मनिरपेक्षता को आयाम देते हुए कहा कि इसका अर्थ है सभी प्रकार की धार्मिक विचारधारा को सम्मान देना. तो आप सीधे सीधे देख सकते हैं फर्क दोनों विचारधाराओं में. एक कहती है किसी धार्मिक विचार को तवज्जो न दो, दूसरी कहती है सभी धर्मों को एक नजर से देखो और उनके विचारों का भी सम्मान करो.

उपरोक्त का सीधा सीधा मतलब निकालें तो वह यह होगा कि यदि किसी जगह पर किसी दुसरे धर्म से कोई सही विचार ग्रहण कर सकते हैं तो हम सही मायने में धर्म निरपेक्ष होंगे. अपने या दूसरों के धर्म या उनकी मान्यताओं को अधिक तवज्जो देने की आवश्यकता नहीं है. बस अपने विचार पर अडिग रहिये, यदि वह विचार सही है, वह मान्यता सही है तो बच जायेगी, वरना समाप्त हो जायेगी. चाहे शिव महिम्नः स्तोत्र हो या गीता, एक ही विचार दिखेगा कि लक्ष्य एक प्रभु तक पंहुचने का है, रास्ता चाहे कोई भी हो, पंहुचेगा एक ही जगह. तो हमारा विचार किसी और के विचार से श्रेष्ट कैसे हुआ? यदि अपने विचार को श्रेष्ट बनाना है तो अपनी विचारधारा को समृद्ध बनाना भी हमारा काम है. हिन्दू धर्म सहिष्णु है, यही हमारी विचारधारा है. यही एक कारण है जो स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार हमारी संस्कृति के जीवित रहने का कारण है. क्या कारण है ग्रीक, मिस्र या मेसोपोटामिया के लोग समाप्त हो गए, या मंगोल समाप्त हो गए? हम बचे हैं हमारे दृढ विचार धारा के कारण जो हमें यह सिखाती है "उदार चरितानाम वसुधैव कुटुम्बकम" अर्थात उदार चरित वालों के लिए तो सारी धरती एक कुटुंब के समान है.

अतः अपनी धर्मनिरपेक्षता को नया आयाम दीजिये, इसे धर्म के प्रति उदासीनता नहीं, वरना धर्म के प्रति जागरूकता बनाइये. निकाल फैंकिए ऐसे किसी भी विचार को जो संकीर्ण बनाता है आपकी मानसिकता को या आपको विनाश की और लेकर जाता है. माँ भारती आपके मार्ग को प्रशस्त करे.


रविन्द्र सिंह ढुल/२४.१२.२०११