तमन्ना आज बगीचे
में अकेली घूम रही थी. सामने उसका पसंदीदा पौधा था; बेहद सुन्दर रंग वाले फूल
खिलते थे उसपर. केवल एक ही समस्या थी; उसमें कांटे थे...बहुत पैने कांटे जो कभी भी
चुभ सकते थे. पर तमन्ना को वह पौधा जान से प्यारा था. आज उसने फूलों से छेड़खानी की
ठान ली थी. जैसे ही उसने छूने की ठानी और हाथ लगाया काँटों से उसका हाथ छिल गया.
तमन्ना बेहद परेशान हुई और चली गयी. बाहर पार्क में घूमते हुए तमन्ना को एक छोटा
सा पौधा बहुत अच्छा लगा. गहरी नारंगी टहनियों के साथ उस पौधे में छोटे छोटे पत्ते
आये हुए थे. उन पत्तों को छेड़ने में तमन्ना को बहुत अधिक आनंद आ रहा था. तमन्ना ने
उस पौधे को अपने साथ ले लिया और चल दी अपने बगीचे की तरफ. बगीचे में उस पौधे को
लगा कर तमन्ना ने उसमे पहली बार पानी डाला. पौधे के पत्तों पर गिरा पानी तमन्ना को
भा रहा था. उस पौधे के साथ खेलना और अठखेलियाँ करना तमन्ना का हर रोज का कार्य हो
गया. पत्तों को हाथ में लेकर छेड़ना और हर रोज पानी देना. पौधा अब बड़ा हो रहा था.
एक दिन उस पौधे पर सुर्ख लाल रंग का फूल निकला. फूल ऐसा कि उसे देखना अपने आप में
तमन्ना के लिए बेहद सुखद अनुभव था. तमन्ना ने उस फूल को तोड़ लिया और अपने पास रख
लिया. सारा दिन उस फूल के साथ खेलने में बीता. लगातार मिल रहे ध्यान से वह पौधा
फूलों से घिर गया. अब तमन्ना अपने पुराने पौधे को देखती नहीं थी जिसके कारण उसके
हाथ कभी छिले थे. समय बीतता गया और साथ ही उस पौधे का और तमन्ना का रिश्ता और भी
पुख्ता हो गया. एक दिन तमन्ना ने देखा उसके पुराने पौधे पर आज बेहद सुंदर नारंगी
फूल निकला है. उस फूल की छटा उन लाल रंग के फूलों से कही ज्यादा सुन्दर थी. आज
तमन्ना ने नारंगी फूल को तोडा और अपने साथ ले गयी. दुसरे पौधे पर लगे लाल फूल के
बोझ से पौधा झुक गया और शाम होते होते वह फूल मुरझा गया. तमन्ना अब अपने पुराने
पौधे में पानी देती; उसके साथ खेलती. फूल आ रहे थे तो कांटे पीछे छिप गये. पर नए
पौधे पर लग रहे फूल अब सूख रहे थे. उन्हें कोई न सहलाता और कोई न तोड़ता. न ही उस
पौधे को पानी देता. तमन्ना के बगीचे में लगा नया पौधा अब सूखने लगा था. कुछ दिन यह
सिलसिला चलता रहा. एक दिन तमन्ना सुबह उठी और अपने नए पौधे को देखने के लिए चल पड़ी.
बाहर बागीचे में तमन्ना जैसे ही गयी तो देखा वह पौधा पूरी तरह से सूख चूका था.
पुराने पौधे पर लगे नारंगी फूल तमन्ना का इन्तजार कर रहे थे. सुर्ख लाल फूलों का
नामोनिशान मिट चूका था. न किसी ने उसके फूल ही तोड़े; न ही किसी ने इसे पानी ही
दिया. तमन्ना के बागीचे का नया पौधा मुरझा चुका था. पुराने पौधे पर अब भी फूल लग
रहे थे. पर अब वह पौधा नहीं बचा था जिसके फूलों से और पत्तों से तमन्ना को बहुत
प्यार था कभी.
पथ उस राही का जिसे न मंजिल पता है और न ही राह। उसे बस चलना आता है। राही को साथ ले भी और अकेले भी।
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Friday, August 7, 2015
Wednesday, October 22, 2014
ज्ञान असत्य है
समस्त ज्ञान असत्य है एवं समस्त सत्य ज्ञान का स्वरुप है। समस्त सांसारिक ज्ञान केवल मात्र तर्क की शक्ति पर टिका है एवं जब तक वह तर्क की सीमा को पार नहीं कर देता उसे संसार ज्ञान की श्रेणी में नहीं रखता। श्री रामकृष्ण परमहँस कहते हैं कि ज्ञान विश्वास से पैदा होता है न कि तर्क से। प्रथम आपकी बुद्धि स्वीकार करेगी उस उस अनजान को उसके बाद ही ज्ञान पैदा होगा एवं जन्म लेगा। यदि बुद्धि स्वीकार करने की स्थिति में होगी ही नहीं तो ज्ञान आ ही नहीं सकता। साकार ब्रह्म अथवा निराकार ब्रह्म दोनों ही उस ज्ञान के स्वरूप हैं। श्री परमहँस भी उस ज्ञान से जन्म लेते हैं तथा श्री दयानंद भी। जहाँ एक ओर हजरत मोहम्मद उस ही ज्ञान से जन्म लेते हैं तो दूसरी ओर ओशो भी उस ज्ञान का स्वरुप मात्र है। यदि हम इन परस्पर विरोधाभासी महापुरुषों को एक तर्क की श्रेणी में रखेंगे तो हम समझ पाएंगे कि सभी का ज्ञान अधूरा है। वहीँ दूसरी ओर यदि किसी एक के ऊपर दृढ विश्वास किया जाए तो सभी पूर्ण हैं। अतः स्पष्ट है कि विश्वास कीजिये कि तर्क के परे झाँका जा सकता है। माँ भारती आप सबका मार्ग प्रशस्त करे।
रविन्द्र सिंह ढुल
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Sunday, July 6, 2014
स्थिर बुद्धि की आवश्यकता
दुःखेष्वनुद्विग्मनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2/56 (गीता)
भावार्थ: जो दुःख में विचलित न हो तथा सुख में प्रसन्न नहीं होता , जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य ही मुनि कहलाता है।
ईश्वर कहते हैं कि मुनि अर्थात मनुष्य जीवन की सर्वोच्च अवस्था केवल उसे ही प्राप्त होती है जो सुख दुःख में सम भाव तथा आसक्ति, भय एवं क्रोध से स्वयं को मुक्त रखता है। मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों में से एक लक्ष्य इस स्थिर बुद्धि को प्राप्त करना भी है। एकाँकी जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था वह है जहाँ हम स्थिर बुद्धि हो सभी प्रकार के विघ्नों क़ा सामना करते हैं। जीवन में आशा एवं निराशा दोनों भाव हनिकारक हैँ। केवल कर्म भाव ही एक मात्र सत्य है तथा उसपर स्वयं का आधिकार भी श्रीभगवान गीता में देते हैं। कर्मफल के ऊपर हमारा कोई भी अधिकार नहीं है; यह महत्त्वपूर्ण शिक्षा आज भी उतनी ही आवश्यक है जितनी गीता के समय प्रासंगिक थी।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2/57 (गीता)
भावार्थ: इस भौतिक जगत में जो व्यक्ति न तो शुभ की प्राप्ति से हर्षित होता है और न ही दुःख के प्राप्त होने पर उससे घृणा करता हैं, वह पूर्ण ज्ञान में स्थिर होता है।
समस्त ज्ञान इस बात में ही है क़ि सुख एवम दुःख समभाव हैं तथा प्रज्ञा अर्थात बुद्धि के लिए यह समझना आवश्यक है। इस ज्ञान को समझे बिना मनुष्य के लिए जीवन यापन सदा ही एक समस्या रहेगा।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। 2/62 (गीता)
भावार्थ: विषयोंका निरंतर चिंतन करनेवाले पुरुषकी विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे उन विषयोंकी कामना उत्पन्न होती है और कामनामें (विघ्न पडनेसे) क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2/63 (गीता)
भावार्थ: क्रोधसे संमोह (मूढभाव) उत्पन्न होता है, संमोहसे स्मृतिभ्रम होता है (भान भूलना), स्मृतिभ्रम से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश होता है, और बुद्धिनाश होने से सर्वनाश हो जाता है।
बुद्धि की समाप्ति के साथ ही मनुष्य की चेतना का नाश हो जाता है तथा इसके साथ ही मनुष्य एक न समाप्त होने वाले गर्त में गिर जाता है तथा अंततः स्वयं को समाप्त कर लेता है।
मनुष्य का सर्वोच्च कर्म यह है कि वह स्थिर बुद्धि से कार्य करे एवं आगे बढ़े; इस प्रकार भगवत इच्छा के अनुरूप जीवन सरलता एवँ सुगमता से चलता है।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2/56 (गीता)
भावार्थ: जो दुःख में विचलित न हो तथा सुख में प्रसन्न नहीं होता , जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य ही मुनि कहलाता है।
ईश्वर कहते हैं कि मुनि अर्थात मनुष्य जीवन की सर्वोच्च अवस्था केवल उसे ही प्राप्त होती है जो सुख दुःख में सम भाव तथा आसक्ति, भय एवं क्रोध से स्वयं को मुक्त रखता है। मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों में से एक लक्ष्य इस स्थिर बुद्धि को प्राप्त करना भी है। एकाँकी जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था वह है जहाँ हम स्थिर बुद्धि हो सभी प्रकार के विघ्नों क़ा सामना करते हैं। जीवन में आशा एवं निराशा दोनों भाव हनिकारक हैँ। केवल कर्म भाव ही एक मात्र सत्य है तथा उसपर स्वयं का आधिकार भी श्रीभगवान गीता में देते हैं। कर्मफल के ऊपर हमारा कोई भी अधिकार नहीं है; यह महत्त्वपूर्ण शिक्षा आज भी उतनी ही आवश्यक है जितनी गीता के समय प्रासंगिक थी।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2/57 (गीता)
भावार्थ: इस भौतिक जगत में जो व्यक्ति न तो शुभ की प्राप्ति से हर्षित होता है और न ही दुःख के प्राप्त होने पर उससे घृणा करता हैं, वह पूर्ण ज्ञान में स्थिर होता है।
समस्त ज्ञान इस बात में ही है क़ि सुख एवम दुःख समभाव हैं तथा प्रज्ञा अर्थात बुद्धि के लिए यह समझना आवश्यक है। इस ज्ञान को समझे बिना मनुष्य के लिए जीवन यापन सदा ही एक समस्या रहेगा।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। 2/62 (गीता)
भावार्थ: विषयोंका निरंतर चिंतन करनेवाले पुरुषकी विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे उन विषयोंकी कामना उत्पन्न होती है और कामनामें (विघ्न पडनेसे) क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2/63 (गीता)
भावार्थ: क्रोधसे संमोह (मूढभाव) उत्पन्न होता है, संमोहसे स्मृतिभ्रम होता है (भान भूलना), स्मृतिभ्रम से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश होता है, और बुद्धिनाश होने से सर्वनाश हो जाता है।
बुद्धि की समाप्ति के साथ ही मनुष्य की चेतना का नाश हो जाता है तथा इसके साथ ही मनुष्य एक न समाप्त होने वाले गर्त में गिर जाता है तथा अंततः स्वयं को समाप्त कर लेता है।
मनुष्य का सर्वोच्च कर्म यह है कि वह स्थिर बुद्धि से कार्य करे एवं आगे बढ़े; इस प्रकार भगवत इच्छा के अनुरूप जीवन सरलता एवँ सुगमता से चलता है।
Friday, August 16, 2013
धर्म समन्वय के ऊपर स्वामी विवेकानंद जी के कुछ विचार
"संसार के लिए यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात होगी यदि सभी मनुष्य एक ही धर्म, उपासना की एक ही पद्यति और नैतिकता के एक ही आदर्श को स्वीकार कर लें। इससे सभी धार्मिक और आद्यात्मिक उन्नति को मृत्यु जैसा आघात पंहुचेगा। "
दूसरे धर्म या मत के लिए हमें केवल सहनशीलता नहीं दिखानी है; बल्कि प्रत्यक्ष रूप से उन्हें स्वीकार करना होगा; और यही सत्य सब धर्मों की नींव है। "
"साधुता, पवित्रता और सेवा किसी सम्प्रदाय विशेष की संपत्ति नहीं है; और प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ट तथा अतिशय उन्नत चरित्र के नर-नारियों को जन्म दिया है। इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्य सारे धर्म नष्ट हो जाएँ और केवल उसी का धर्म जीवित रहेगा, तो मैं अपने हृदय के अन्तस्तल से उस पर दया करता हूँ और उसे स्पष्ट बता देना चाहता हूँ कि सारे प्रतिरोधों के बावजूद, शीघ्र ही प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा होगा-संघर्ष नहीं सहयोग; पर भाव-विनाश नहीं पर भाव ग्रहण, मतभेद और कलह नहीं, समन्वय और शान्ति। "
***
कल कुछ और विचार प्रस्तुत करूंगा।
दूसरे धर्म या मत के लिए हमें केवल सहनशीलता नहीं दिखानी है; बल्कि प्रत्यक्ष रूप से उन्हें स्वीकार करना होगा; और यही सत्य सब धर्मों की नींव है। "
"साधुता, पवित्रता और सेवा किसी सम्प्रदाय विशेष की संपत्ति नहीं है; और प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ट तथा अतिशय उन्नत चरित्र के नर-नारियों को जन्म दिया है। इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्य सारे धर्म नष्ट हो जाएँ और केवल उसी का धर्म जीवित रहेगा, तो मैं अपने हृदय के अन्तस्तल से उस पर दया करता हूँ और उसे स्पष्ट बता देना चाहता हूँ कि सारे प्रतिरोधों के बावजूद, शीघ्र ही प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा होगा-संघर्ष नहीं सहयोग; पर भाव-विनाश नहीं पर भाव ग्रहण, मतभेद और कलह नहीं, समन्वय और शान्ति। "
***
कल कुछ और विचार प्रस्तुत करूंगा।
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