तमन्ना आज बगीचे
में अकेली घूम रही थी. सामने उसका पसंदीदा पौधा था; बेहद सुन्दर रंग वाले फूल
खिलते थे उसपर. केवल एक ही समस्या थी; उसमें कांटे थे...बहुत पैने कांटे जो कभी भी
चुभ सकते थे. पर तमन्ना को वह पौधा जान से प्यारा था. आज उसने फूलों से छेड़खानी की
ठान ली थी. जैसे ही उसने छूने की ठानी और हाथ लगाया काँटों से उसका हाथ छिल गया.
तमन्ना बेहद परेशान हुई और चली गयी. बाहर पार्क में घूमते हुए तमन्ना को एक छोटा
सा पौधा बहुत अच्छा लगा. गहरी नारंगी टहनियों के साथ उस पौधे में छोटे छोटे पत्ते
आये हुए थे. उन पत्तों को छेड़ने में तमन्ना को बहुत अधिक आनंद आ रहा था. तमन्ना ने
उस पौधे को अपने साथ ले लिया और चल दी अपने बगीचे की तरफ. बगीचे में उस पौधे को
लगा कर तमन्ना ने उसमे पहली बार पानी डाला. पौधे के पत्तों पर गिरा पानी तमन्ना को
भा रहा था. उस पौधे के साथ खेलना और अठखेलियाँ करना तमन्ना का हर रोज का कार्य हो
गया. पत्तों को हाथ में लेकर छेड़ना और हर रोज पानी देना. पौधा अब बड़ा हो रहा था.
एक दिन उस पौधे पर सुर्ख लाल रंग का फूल निकला. फूल ऐसा कि उसे देखना अपने आप में
तमन्ना के लिए बेहद सुखद अनुभव था. तमन्ना ने उस फूल को तोड़ लिया और अपने पास रख
लिया. सारा दिन उस फूल के साथ खेलने में बीता. लगातार मिल रहे ध्यान से वह पौधा
फूलों से घिर गया. अब तमन्ना अपने पुराने पौधे को देखती नहीं थी जिसके कारण उसके
हाथ कभी छिले थे. समय बीतता गया और साथ ही उस पौधे का और तमन्ना का रिश्ता और भी
पुख्ता हो गया. एक दिन तमन्ना ने देखा उसके पुराने पौधे पर आज बेहद सुंदर नारंगी
फूल निकला है. उस फूल की छटा उन लाल रंग के फूलों से कही ज्यादा सुन्दर थी. आज
तमन्ना ने नारंगी फूल को तोडा और अपने साथ ले गयी. दुसरे पौधे पर लगे लाल फूल के
बोझ से पौधा झुक गया और शाम होते होते वह फूल मुरझा गया. तमन्ना अब अपने पुराने
पौधे में पानी देती; उसके साथ खेलती. फूल आ रहे थे तो कांटे पीछे छिप गये. पर नए
पौधे पर लग रहे फूल अब सूख रहे थे. उन्हें कोई न सहलाता और कोई न तोड़ता. न ही उस
पौधे को पानी देता. तमन्ना के बगीचे में लगा नया पौधा अब सूखने लगा था. कुछ दिन यह
सिलसिला चलता रहा. एक दिन तमन्ना सुबह उठी और अपने नए पौधे को देखने के लिए चल पड़ी.
बाहर बागीचे में तमन्ना जैसे ही गयी तो देखा वह पौधा पूरी तरह से सूख चूका था.
पुराने पौधे पर लगे नारंगी फूल तमन्ना का इन्तजार कर रहे थे. सुर्ख लाल फूलों का
नामोनिशान मिट चूका था. न किसी ने उसके फूल ही तोड़े; न ही किसी ने इसे पानी ही
दिया. तमन्ना के बागीचे का नया पौधा मुरझा चुका था. पुराने पौधे पर अब भी फूल लग
रहे थे. पर अब वह पौधा नहीं बचा था जिसके फूलों से और पत्तों से तमन्ना को बहुत
प्यार था कभी.
पथ उस राही का जिसे न मंजिल पता है और न ही राह। उसे बस चलना आता है। राही को साथ ले भी और अकेले भी।
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Friday, August 7, 2015
Tuesday, November 11, 2014
याद है/ Unknown Author
याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,
सड़्क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब
चलते चलते
थक जाता था
तुम कहती थीं ,
बस
उस अगले खम्भे
तक और ।
आज
मैं अकेला ही
उस सड़्क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब
निगाह से
देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता
पूछ रहे हैं
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद
अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा
इन्तजार कर रही हो !
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,
सड़्क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब
चलते चलते
थक जाता था
तुम कहती थीं ,
बस
उस अगले खम्भे
तक और ।
आज
मैं अकेला ही
उस सड़्क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब
निगाह से
देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता
पूछ रहे हैं
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद
अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा
इन्तजार कर रही हो !
Tuesday, July 22, 2014
अनजान राह का तन्हा राही
तन्हा राही राह चलता जाएगा; अब तो जो भी होगा देखा जाएगा। नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस के जीवन चरित्र पर बनी एक फिल्म के गीत के उपरोक्त बोल एक ऐसे बाग़ी के हैं जिसने स्वयं की राह चुनी एवं उस राह पर चल दिए। इन्हें न मंजिल की फ़िक्र थी और न ही रास्ते की। इन्हें यह भी फ़िक्र नहीं थी कि कोई इनके साथ था अथवा नहीं था। जीवन में बहुत सा ले आये और जीवन में बहुत सा पीछे छोड़ आये। पीछे मुड़ कर न देखा। बस चले गए और चले गए। समाज कहाँ इनको फ़िक्र नहीं ; व्यक्ति विशेष कहाँ इन्हें पता नहीं। राष्ट्र क्या ; उनकी सीमाएं क्या। बस परम सत्य यह है कि वे राही हैं और उनकी राह अबूझ है ;उनका तरीका अबूझ है और उसे कोई समझ न पाया है। अन्धकार कहाँ समझ पाया कि उसके बाहर रौशनी की किरण होती है। रौशनी कहाँ समझ पायी कि उसके पीछे अन्धकार छिपा है।
इस अबूझ राह पर एक और अनजान राही चल पड़ा है और यह गीत गुनगुना रहा है। फैज़ की शायरी पढ़ रहा है ,"चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। "
चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। मंजिल भी कहाँ आती है ; यह राही तो दूसरी मंजिल ढूंढ चल पड़ता है। जिसे चलने से प्रेम हो उसे मंजिल से नहीं राह से लगाव होता है।
अनजान राह के तन्हा राही का सलाम!
इस अबूझ राह पर एक और अनजान राही चल पड़ा है और यह गीत गुनगुना रहा है। फैज़ की शायरी पढ़ रहा है ,"चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। "
चले चलो के मंजिल अभी नहीं आई। मंजिल भी कहाँ आती है ; यह राही तो दूसरी मंजिल ढूंढ चल पड़ता है। जिसे चलने से प्रेम हो उसे मंजिल से नहीं राह से लगाव होता है।
अनजान राह के तन्हा राही का सलाम!
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Saturday, March 8, 2014
हम दीवानों की क्या हस्ती/भगवतीचरण वर्मा
हम दीवानों की क्या हस्ती,
हम आज यहाँ कल वहां चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उडाते जहाँ चले
आए बनकर उल्लास अभी
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले?
किस ओर चले? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले।
दो बात कही, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोये,
छक कर सुख दुःख घूंटों को
हम एक भाव से पिए चले।
हम भिखमंगों की दुनिया में
स्वछंद लुटा कर प्यार चले,
हम एक निशानी सी उर पर,
ले असफलता का भार चले
हम मान रहित, अपमान रहित
जी भरकर खुलकर खेल चुके,
हम हँसते हँसते आज यहाँ
प्राणों की बाजी हार चले!
हम भला बुरा सब भूल चुके,
नतमस्तक हो मुख मोड़ चले,
अभिशाप उठाकर होठों पर
वरदान दृगों से छोड़ चले
अब अपना और पराया क्या?
आबाद रहे रुकने वाले!
हम स्वयं बंधे थे,
और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले!
हम आज यहाँ कल वहां चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उडाते जहाँ चले
आए बनकर उल्लास अभी
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले?
किस ओर चले? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले।
दो बात कही, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोये,
छक कर सुख दुःख घूंटों को
हम एक भाव से पिए चले।
हम भिखमंगों की दुनिया में
स्वछंद लुटा कर प्यार चले,
हम एक निशानी सी उर पर,
ले असफलता का भार चले
हम मान रहित, अपमान रहित
जी भरकर खुलकर खेल चुके,
हम हँसते हँसते आज यहाँ
प्राणों की बाजी हार चले!
हम भला बुरा सब भूल चुके,
नतमस्तक हो मुख मोड़ चले,
अभिशाप उठाकर होठों पर
वरदान दृगों से छोड़ चले
अब अपना और पराया क्या?
आबाद रहे रुकने वाले!
हम स्वयं बंधे थे,
और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले!
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Thursday, December 19, 2013
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
आज अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खान की पुण्य तिथि है। उनकी पुण्य तिथि पर मैं राम प्रसाद बिस्मिल की लिखी कविता जो लहू में उबाल ला देती है; उसे पेश कर रहा हूँ:
हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को
जीते जी हमने छुडाया उसी कशाने को
क्या न था और बहाना कोई तडपाने को
आस्मां क्या यही बाक़ी था सितम ढाने को
लाके ग़ुरबत में जो रक्खा हमें तरसाने को
फिर न गुलशन में हमें लाएगा सैयाद कभी
याद आएगा किसे यह दिल-ए-नाशाद कभी
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फ़रियाद कभी
हम भी इस बाग़ में थे क़ैद से आज़ाद कभी
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को
दिल फ़िदा करते हैं क़ुरबान जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खाना वीरान कहां देखिए घर करते हैं
ख़ुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को
न मयस्सर हुआ राहत से कभी मेल हमें
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें
एक दिन का भी न मंज़ूर हुआ बेल हमें
याद आएगा अलीपुर का बहुत जेल हमें
लोग तो भूल गये होंगे उस अफ़साने को
अंडमान ख़ाक तेरी क्यों न हो दिल में नाज़ा
छूके चरणों को जो पिंगले के हुई है जीशां
मरतबा इतना बढ़े तेरी भी तक़दीर कहां
आते आते जो रहे ‘बॉल तिलक‘ भी मेहमां
‘मांडले' को ही यह एज़ाज़ मिला पाने को
बात तो जब है कि इस बात की ज़िदे ठानें
देश के वास्ते क़ुरबान करें हम जानें
लाख समझाए कोई, उसकी न हरगिज़ मानें
बहते हुए ख़ून में अपना न गरेबां सानें
नासेह, आग लगे इस तेरे समझाने को
अपनी क़िस्मत में अज़ल से ही सितम रक्खा था
रंज रक्खा था, मेहन रक्खा था, ग़म रक्खा था
किसको परवाह थी और किसमे ये दम रक्खा था
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हम भी मां बाप के पाले थे, बड़े दुःख सह कर
वक़्त-ए-रुख्ह्सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आंसू जो टपके कभी रूख़ से बह कर
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को
देश-सेवा का ही बहता है लहू नस-नस में
हम तो खा बैठे हैं चित्तौड के गढ की क़समें
सरफरोशी की अदा होती हैं यों ही रसमें
भाल-ए-खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में
बहनो, तैयार चिताओं में हो जल जाने को
अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली
एक होती है फक़ीरों की हमेशा बोली
ख़ून में फाग रचाएगी हमारी टोली
जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को
अपना कुछ ग़म नहीं पर हमको ख़याल आता है
मादर-ए-हिंद पर कब तक जवाल आता है
‘हरादयाल‘ आता है ‘यरोप‘ से न ‘लाल‘ आता है
देश के हाल पे रह रह के मलाल आता है
मुन्तजिर रहते हैं हम ख़ाक में मिल जाने को
नौजवानों, जो तबीयत में तुम्हारी ख़टके
याद कर लेना हमें भी कभी भूले-भटके
आप के जुज़वे बदन होवे जुदा कट-कट के
और सद चाक हो माता का कलेजा फटके
पर न माथे पे शिकन आए क़सम खाने को
देखें कब तक ये असिरान-ए-मुसीबत छूटें
मादर-ए-हिंद के कब भाग खुलें या फूटें
‘गाँधी अफ़्रीका की बाज़ारों में सडकें कूटें
और हम चैन से दिन रात बहारें लूटें
क्यों न तरजीह दें इस जीने पे मर जाने को
कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी
ज़िंदगी भर को हमें भेज के काले पानी
मुंह में जल्लाद हुए जाते हैं छाले पानी
आब-ए-खंजर का पिला करके दुआ ले पानी
भरने क्यों जायें कहीं उम्र के पैमाने को
मैक़दा किसका है ये जाम-ए-सुबू किसका है
वार किसका है जवानों ये गुलू किसका है
जो बहे क़ौम के खातिर वो लहू किसका है
आस्मां सॉफ बता दे तू अदू किसका है
क्यों नये रंग बदलता है तू तड्पाने को
दर्दमन्दों से मुसीबत की हलावत पूछो
मरने वालों से ज़रा लुत्फ़-ए-शहादत पूछो
चश्म-ए-गुस्ताख से कुछ दीद की हसरत पूछो
कुश्त-ए-नाज़ से ठोकर की क़यामत पूछो
सोज़ कहते हैं किसे पूछ लो परवाने को
नौजवानों यही मौक़ा है उठो खुल खेलो
और सर पर जो बला आए ख़ुशी से झेलो
क़ौम के नाम पे सदक़े पे जवानी दे दो
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएं ले लो
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने को
हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को
जीते जी हमने छुडाया उसी कशाने को
क्या न था और बहाना कोई तडपाने को
आस्मां क्या यही बाक़ी था सितम ढाने को
लाके ग़ुरबत में जो रक्खा हमें तरसाने को
फिर न गुलशन में हमें लाएगा सैयाद कभी
याद आएगा किसे यह दिल-ए-नाशाद कभी
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फ़रियाद कभी
हम भी इस बाग़ में थे क़ैद से आज़ाद कभी
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को
दिल फ़िदा करते हैं क़ुरबान जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खाना वीरान कहां देखिए घर करते हैं
ख़ुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को
न मयस्सर हुआ राहत से कभी मेल हमें
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें
एक दिन का भी न मंज़ूर हुआ बेल हमें
याद आएगा अलीपुर का बहुत जेल हमें
लोग तो भूल गये होंगे उस अफ़साने को
अंडमान ख़ाक तेरी क्यों न हो दिल में नाज़ा
छूके चरणों को जो पिंगले के हुई है जीशां
मरतबा इतना बढ़े तेरी भी तक़दीर कहां
आते आते जो रहे ‘बॉल तिलक‘ भी मेहमां
‘मांडले' को ही यह एज़ाज़ मिला पाने को
बात तो जब है कि इस बात की ज़िदे ठानें
देश के वास्ते क़ुरबान करें हम जानें
लाख समझाए कोई, उसकी न हरगिज़ मानें
बहते हुए ख़ून में अपना न गरेबां सानें
नासेह, आग लगे इस तेरे समझाने को
अपनी क़िस्मत में अज़ल से ही सितम रक्खा था
रंज रक्खा था, मेहन रक्खा था, ग़म रक्खा था
किसको परवाह थी और किसमे ये दम रक्खा था
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हम भी मां बाप के पाले थे, बड़े दुःख सह कर
वक़्त-ए-रुख्ह्सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आंसू जो टपके कभी रूख़ से बह कर
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को
देश-सेवा का ही बहता है लहू नस-नस में
हम तो खा बैठे हैं चित्तौड के गढ की क़समें
सरफरोशी की अदा होती हैं यों ही रसमें
भाल-ए-खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में
बहनो, तैयार चिताओं में हो जल जाने को
अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली
एक होती है फक़ीरों की हमेशा बोली
ख़ून में फाग रचाएगी हमारी टोली
जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को
अपना कुछ ग़म नहीं पर हमको ख़याल आता है
मादर-ए-हिंद पर कब तक जवाल आता है
‘हरादयाल‘ आता है ‘यरोप‘ से न ‘लाल‘ आता है
देश के हाल पे रह रह के मलाल आता है
मुन्तजिर रहते हैं हम ख़ाक में मिल जाने को
नौजवानों, जो तबीयत में तुम्हारी ख़टके
याद कर लेना हमें भी कभी भूले-भटके
आप के जुज़वे बदन होवे जुदा कट-कट के
और सद चाक हो माता का कलेजा फटके
पर न माथे पे शिकन आए क़सम खाने को
देखें कब तक ये असिरान-ए-मुसीबत छूटें
मादर-ए-हिंद के कब भाग खुलें या फूटें
‘गाँधी अफ़्रीका की बाज़ारों में सडकें कूटें
और हम चैन से दिन रात बहारें लूटें
क्यों न तरजीह दें इस जीने पे मर जाने को
कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी
ज़िंदगी भर को हमें भेज के काले पानी
मुंह में जल्लाद हुए जाते हैं छाले पानी
आब-ए-खंजर का पिला करके दुआ ले पानी
भरने क्यों जायें कहीं उम्र के पैमाने को
मैक़दा किसका है ये जाम-ए-सुबू किसका है
वार किसका है जवानों ये गुलू किसका है
जो बहे क़ौम के खातिर वो लहू किसका है
आस्मां सॉफ बता दे तू अदू किसका है
क्यों नये रंग बदलता है तू तड्पाने को
दर्दमन्दों से मुसीबत की हलावत पूछो
मरने वालों से ज़रा लुत्फ़-ए-शहादत पूछो
चश्म-ए-गुस्ताख से कुछ दीद की हसरत पूछो
कुश्त-ए-नाज़ से ठोकर की क़यामत पूछो
सोज़ कहते हैं किसे पूछ लो परवाने को
नौजवानों यही मौक़ा है उठो खुल खेलो
और सर पर जो बला आए ख़ुशी से झेलो
क़ौम के नाम पे सदक़े पे जवानी दे दो
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएं ले लो
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने को
Friday, May 17, 2013
वो जिसके हाथ में छाले हैं
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बँगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है/अदम गोंडवी
उसी के दम से रौनक आपके बँगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है/अदम गोंडवी
मेरा एक जीवन है
मेरा एक जीवन है
उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं
उसमें कोई मेरा अनन्यतम भी है
पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूँ
जिस नगर के गलियारों, फुटपाथ, मैदानों में घूमा हूँ
हँसा खेला हूँ
उसके अनेक हैं नागर, सेठ, म्युनिस्पलम कमिश्नर, नेता
और सैलानी, शतरंजबाज और आवारे
पर मैं इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूँ
देह पर जो लता-सी लिपटी
आँखों में जिसने कामना से निहारा
दुख में जो साथ आए
अपने वक्त पर जिन्होंने पुकारा
जिनके विश्वास पर वचन दिए, पालन किया
जिनका अंतरंग हो कर उनके किसी भी क्षण में मैं जिया
वे सब सुहृद हैं, सर्वत्र हैं, सर्वदा हैं
पर मैं अकेला हूँ
सारे संसार में फैल जाएगा एक दिन मेरा संसार
सभी मुझे करेंगे - दो चार को छोड़ - कभी न कभी प्यार
मेरे सृजन, कर्म-कर्तव्य, मेरे आश्वासन, मेरी स्थापनाएँ
और मेरे उपार्जन, दान-व्यय, मेरे उधार
एक दिन मेरे जीवन को छा लेंगे - ये मेरे महत्व
डूब जाएगा तंत्रीनाद कवित्त रस में, राग में रंग में
मेरा यह ममत्व
जिससे मैं जीवित हूँ
मुझ परितप्त को तब आ कर वरेगी मृत्यु - मैं प्रतिकृत हूँ
पर मैं फिर भी जियुँगा
इसी नगरी में रहूँगा
रूखी रोटी खाउँगा और ठंड़ा पानी पियूँगा
क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूँ/रघुवीर सहाय
उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं
उसमें कोई मेरा अनन्यतम भी है
पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूँ
जिस नगर के गलियारों, फुटपाथ, मैदानों में घूमा हूँ
हँसा खेला हूँ
उसके अनेक हैं नागर, सेठ, म्युनिस्पलम कमिश्नर, नेता
और सैलानी, शतरंजबाज और आवारे
पर मैं इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूँ
देह पर जो लता-सी लिपटी
आँखों में जिसने कामना से निहारा
दुख में जो साथ आए
अपने वक्त पर जिन्होंने पुकारा
जिनके विश्वास पर वचन दिए, पालन किया
जिनका अंतरंग हो कर उनके किसी भी क्षण में मैं जिया
वे सब सुहृद हैं, सर्वत्र हैं, सर्वदा हैं
पर मैं अकेला हूँ
सारे संसार में फैल जाएगा एक दिन मेरा संसार
सभी मुझे करेंगे - दो चार को छोड़ - कभी न कभी प्यार
मेरे सृजन, कर्म-कर्तव्य, मेरे आश्वासन, मेरी स्थापनाएँ
और मेरे उपार्जन, दान-व्यय, मेरे उधार
एक दिन मेरे जीवन को छा लेंगे - ये मेरे महत्व
डूब जाएगा तंत्रीनाद कवित्त रस में, राग में रंग में
मेरा यह ममत्व
जिससे मैं जीवित हूँ
मुझ परितप्त को तब आ कर वरेगी मृत्यु - मैं प्रतिकृत हूँ
पर मैं फिर भी जियुँगा
इसी नगरी में रहूँगा
रूखी रोटी खाउँगा और ठंड़ा पानी पियूँगा
क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूँ/रघुवीर सहाय
Monday, November 12, 2012
नमस्कार
राम गइओ रावन गइओ, जाको बहु परिवार।
कहु नानक थिरु कुछ नहीं, सुपने जिऊँ संसार॥
एक बेहद सुन्दर साखी के साथ आप सब को प्रणाम। श्री गुरु तेग बहादुर के द्वारा रचित इस साखी में वे कहते हैं कि इस संसार से श्री राम भी चले गए, रावण भी चला गया, वे कहते हैं कि आपका कुछ नहीं है और यह संसार एक स्वप्न की तरह है। इस दीपावली के शुभ अवसर पर जब आधा भारत इस बात को सोचने में व्यस्त है कि श्री राम अच्छे पति थे या बुरे थे; ऐसे समय में जब भारत के राजनेता अपनी जुबान पर से पूरा नियंत्रण खो चुके हैं। त्योहारों को एक व्यापार बना दिया गया है; ऐसे समय में आइये हमारी जड़ों में चलें और ऐसे शब्द खोज कर लायें जो इस अँधेरे में रौशनी का एहसास करवाए और हमें इन व्यर्थ चिंताओं से और व्यर्थ दौड़ से मुक्त करवाए। यह दीपावली आप सब के परिवारों के लिए एक नयी रौशनी लेकर आये जिससे आपके अन्दर का अधकार मिटे; बाहर का नहीं। क्या हम रावण के पैरों की धूल बनने के लायक भी हैं जो श्रीराम के चरित्र के बारे में बोलने के समर्थ हो गए हैं।माँ भारती आपका मार्ग प्रशस्त करे। जय हिन्द।
कहु नानक थिरु कुछ नहीं, सुपने जिऊँ संसार॥
एक बेहद सुन्दर साखी के साथ आप सब को प्रणाम। श्री गुरु तेग बहादुर के द्वारा रचित इस साखी में वे कहते हैं कि इस संसार से श्री राम भी चले गए, रावण भी चला गया, वे कहते हैं कि आपका कुछ नहीं है और यह संसार एक स्वप्न की तरह है। इस दीपावली के शुभ अवसर पर जब आधा भारत इस बात को सोचने में व्यस्त है कि श्री राम अच्छे पति थे या बुरे थे; ऐसे समय में जब भारत के राजनेता अपनी जुबान पर से पूरा नियंत्रण खो चुके हैं। त्योहारों को एक व्यापार बना दिया गया है; ऐसे समय में आइये हमारी जड़ों में चलें और ऐसे शब्द खोज कर लायें जो इस अँधेरे में रौशनी का एहसास करवाए और हमें इन व्यर्थ चिंताओं से और व्यर्थ दौड़ से मुक्त करवाए। यह दीपावली आप सब के परिवारों के लिए एक नयी रौशनी लेकर आये जिससे आपके अन्दर का अधकार मिटे; बाहर का नहीं। क्या हम रावण के पैरों की धूल बनने के लायक भी हैं जो श्रीराम के चरित्र के बारे में बोलने के समर्थ हो गए हैं।माँ भारती आपका मार्ग प्रशस्त करे। जय हिन्द।
Friday, January 20, 2012
जिंदगी थक गई मौत चलती रही- गोपाल दास नीरज
एक दिन देखता हूँ की रूठी हुई, चांदनी चन्द्रमा से खड़ी दूर है
एक दिन ये सुना फूल की चोट से, एक पाषाण का दिल हुआ चूर है
एक दिन आंसुओं ने कहा आँख से, रो ना हम आयेंगे कल बदल कर कफ़न
एक दिन एक बोला शलभ दीप से, चूम लूं मैं तुझे तब मुझे कर दफ़न
पर सुनी अनसुनी बात ऐसी हुई, रूठ सोया शलभ लौ मचलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन ये सुना फूल की चोट से, एक पाषाण का दिल हुआ चूर है
एक दिन आंसुओं ने कहा आँख से, रो ना हम आयेंगे कल बदल कर कफ़न
एक दिन एक बोला शलभ दीप से, चूम लूं मैं तुझे तब मुझे कर दफ़न
पर सुनी अनसुनी बात ऐसी हुई, रूठ सोया शलभ लौ मचलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन एक तारा गिरा टूट कर, एक उजड़े हुए नींद ने रख लिया
फूल ने तभी मुस्कुरा कर कहा, ये बुझा है दिया क्यों इसे दिल दिया
बोलने तब लगा नींद का एक त्रिण, हर दुखी को दुखी से सदा प्यार है
आंसुओं के लिए गोद बस धूल है, फूल को तो धरे शीश संसार है
किन्तु झगडा हुआ इस तरह ये ख़तम, फूल झड़ता रहा धूल खिलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
फूल ने तभी मुस्कुरा कर कहा, ये बुझा है दिया क्यों इसे दिल दिया
बोलने तब लगा नींद का एक त्रिण, हर दुखी को दुखी से सदा प्यार है
आंसुओं के लिए गोद बस धूल है, फूल को तो धरे शीश संसार है
किन्तु झगडा हुआ इस तरह ये ख़तम, फूल झड़ता रहा धूल खिलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन कह रही थी भ्रमर से कली, होंठ जूठे किये हैं मुझे तू न छू
कह रहा था भ्रमर सुन अरी बावली, निष्कलुष मैं बनू ले मुझे चूम तू
आ गया एक झोंका तभी उस तरफ, हिल उठी डाल तो भू-गगन हिल गए
कुनमुनाई लजाई कली तो बहुत, आप ही आप लेकिन अधर मिल गए
अंत ऐसे हुआ उस मिलन का मगर, दिन सिसकता रहा रात ढलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
कह रहा था भ्रमर सुन अरी बावली, निष्कलुष मैं बनू ले मुझे चूम तू
आ गया एक झोंका तभी उस तरफ, हिल उठी डाल तो भू-गगन हिल गए
कुनमुनाई लजाई कली तो बहुत, आप ही आप लेकिन अधर मिल गए
अंत ऐसे हुआ उस मिलन का मगर, दिन सिसकता रहा रात ढलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन ज़िंदगी की कड़ी धूप मे, दो पखेरू मिले मुक्त नभ के तले
कुछ ना बोले ना डोले ना कुछ बात की, हो गया प्यार लेकिन नयन जब मिले
होंठ ज्यों ही उठे तो नियती हंस पड़ी, आँधियाँ चल पड़ी तम बरसने लगा
छूट गया हाथ से हाथ भीगा हुआ, गालियाँ मार संसार हँसने लगा
और फिर यूँ कटी विरह की निशा, स्नेह बुझता रहा रात जलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
कुछ ना बोले ना डोले ना कुछ बात की, हो गया प्यार लेकिन नयन जब मिले
होंठ ज्यों ही उठे तो नियती हंस पड़ी, आँधियाँ चल पड़ी तम बरसने लगा
छूट गया हाथ से हाथ भीगा हुआ, गालियाँ मार संसार हँसने लगा
और फिर यूँ कटी विरह की निशा, स्नेह बुझता रहा रात जलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक ऐसी हंसी हंस पड़ी धूल यह लाश इंसान की मुस्कुराने लगी
तान ऐसी किसी ने कहीं छेड़ दी आँख रोती हुई गीत गाने लगी
एक ऐसी किरण छू गई देह मे खुद-ब-खुद प्राण का दीप जलने लगा
एक आवाज़ आई किसी ओर से हर मुसाफिर बिना पाँव चलने लगा
बस इसी ताल पर उम्र की बांसुरी गीत गुनती रही सुर बदलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
तान ऐसी किसी ने कहीं छेड़ दी आँख रोती हुई गीत गाने लगी
एक ऐसी किरण छू गई देह मे खुद-ब-खुद प्राण का दीप जलने लगा
एक आवाज़ आई किसी ओर से हर मुसाफिर बिना पाँव चलने लगा
बस इसी ताल पर उम्र की बांसुरी गीत गुनती रही सुर बदलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
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Sunday, January 8, 2012
तू गान प्रेम का गाता चल,
लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सिसकियों और चित्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों का हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।
आशा के स्वर का भार, पवन को लेकिन , लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।
रंगो के सातों घट उँड़ेल, यह अँधियारी रँग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।
आदर्शों से आदर्श भिड़े, प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है, धरती की किस्मत फूट रही।
आवर्तों का है विषम जाल, निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई सभ्यता डूबने जाती है।
जब-जब मस्तिष्क जयी होता, संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय, तू यह संवाद सुनाता चल।
सूरज है जग का बुझा-बुझा, चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई, आलोक न इनका जगता है,
इन मलिन ग्रहों के प्राणों में कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर घिसकर इनको ताजा कर दे।
दीपक के जलते प्राण, दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को अपनी अस्थियाँ जलाता चल।
क्या उन्हें देख विस्मित होना, जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे सोने-चाँदी के तारों में ?
मानवता का तू विप्र, गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल जलने भर का अधिकारी है।
ले बड़ी खुशी से उठा, सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल, मगर उस का भी मोल चुकाता चल।
काया की कितनी धूम-धाम! दो रोज चमक बुझ जाती है;
छाया पीती पीयुष, मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है ।
लेने दे जग को उसे, ताल पर जो कलहंस मचलता है,
तेरा मराल जल के दर्पण में नीचे-नीचे चलता है।
कनकाभ धूल झर जाएगी, वे रंग कभी उड़ जाएँगे,
सौरभ है केवल सार, उसे तू सब के लिए जुगाता चल।
क्या अपनी उन से होड़, अमरता की जिनको पहचान नहीं,
छाया से परिचय नहीं, गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं?
जो चतुर चाँद का रस निचोड़ प्यालों में ढाला करते हैं,
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से जो इत्र निकाला करते हैं।
ये भी जाएँगे कभी, मगर, आधी मनुष्यतावालों पर,
जैसे मुसकाता आया है, वैसे अब भी मुसकाता चल।
सभ्यता-अंग पर क्षत कराल, यह अर्थ-मानवों का बल है,
हम रोकर भरते उसे, हमारी आँखों में गंगाजल है।
शूली पर चढा मसीहा को वे फूले नहीं समाते हैं
हम शव को जीवित करने को छायापुर में ले जाते हैं।
भींगी चाँदनियों में जीता, जो कठिन धूप में मरता है,
उजियाली से पीड़ित नर के मन में गोधूलि बसाता चल।
यह देख नयी लीला उन की, फिर उन ने बड़ा कमाल किया,
गाँधी के लोहू से सारे, भारत-सागर को लाल किया।
जो उठे राम, जो उठे कृष्ण, भारत की मिट्टी रोती है,
क्य हुआ कि प्यारे गाँधी की यह लाश न जिन्दा होती है?
तलवार मारती जिन्हें, बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती,
जीवनी-शक्ति के अभिमानी! यह भी कमाल दिखलाता चल।
धरती के भाग हरे होंगे, भारती अमृत बरसाएगी,
दिन की कराल दाहकता पर चाँदनी सुशीतल छाएगी।
ज्वालामुखियों के कण्ठों में कलकण्ठी का आसन होगा,
जलदों से लदा गगन होगा, फूलों से भरा भुवन होगा।
बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी, मूर्तियाँ एक दिन बोलेंगी,
मुँह खोल-खोल सब के भीतर शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सिसकियों और चित्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों का हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।
आशा के स्वर का भार, पवन को लेकिन , लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।
रंगो के सातों घट उँड़ेल, यह अँधियारी रँग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।
आदर्शों से आदर्श भिड़े, प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है, धरती की किस्मत फूट रही।
आवर्तों का है विषम जाल, निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई सभ्यता डूबने जाती है।
जब-जब मस्तिष्क जयी होता, संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय, तू यह संवाद सुनाता चल।
सूरज है जग का बुझा-बुझा, चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई, आलोक न इनका जगता है,
इन मलिन ग्रहों के प्राणों में कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर घिसकर इनको ताजा कर दे।
दीपक के जलते प्राण, दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को अपनी अस्थियाँ जलाता चल।
क्या उन्हें देख विस्मित होना, जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे सोने-चाँदी के तारों में ?
मानवता का तू विप्र, गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल जलने भर का अधिकारी है।
ले बड़ी खुशी से उठा, सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल, मगर उस का भी मोल चुकाता चल।
काया की कितनी धूम-धाम! दो रोज चमक बुझ जाती है;
छाया पीती पीयुष, मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है ।
लेने दे जग को उसे, ताल पर जो कलहंस मचलता है,
तेरा मराल जल के दर्पण में नीचे-नीचे चलता है।
कनकाभ धूल झर जाएगी, वे रंग कभी उड़ जाएँगे,
सौरभ है केवल सार, उसे तू सब के लिए जुगाता चल।
क्या अपनी उन से होड़, अमरता की जिनको पहचान नहीं,
छाया से परिचय नहीं, गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं?
जो चतुर चाँद का रस निचोड़ प्यालों में ढाला करते हैं,
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से जो इत्र निकाला करते हैं।
ये भी जाएँगे कभी, मगर, आधी मनुष्यतावालों पर,
जैसे मुसकाता आया है, वैसे अब भी मुसकाता चल।
सभ्यता-अंग पर क्षत कराल, यह अर्थ-मानवों का बल है,
हम रोकर भरते उसे, हमारी आँखों में गंगाजल है।
शूली पर चढा मसीहा को वे फूले नहीं समाते हैं
हम शव को जीवित करने को छायापुर में ले जाते हैं।
भींगी चाँदनियों में जीता, जो कठिन धूप में मरता है,
उजियाली से पीड़ित नर के मन में गोधूलि बसाता चल।
यह देख नयी लीला उन की, फिर उन ने बड़ा कमाल किया,
गाँधी के लोहू से सारे, भारत-सागर को लाल किया।
जो उठे राम, जो उठे कृष्ण, भारत की मिट्टी रोती है,
क्य हुआ कि प्यारे गाँधी की यह लाश न जिन्दा होती है?
तलवार मारती जिन्हें, बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती,
जीवनी-शक्ति के अभिमानी! यह भी कमाल दिखलाता चल।
धरती के भाग हरे होंगे, भारती अमृत बरसाएगी,
दिन की कराल दाहकता पर चाँदनी सुशीतल छाएगी।
ज्वालामुखियों के कण्ठों में कलकण्ठी का आसन होगा,
जलदों से लदा गगन होगा, फूलों से भरा भुवन होगा।
बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी, मूर्तियाँ एक दिन बोलेंगी,
मुँह खोल-खोल सब के भीतर शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
Saturday, January 7, 2012
जिसे भी देखिये नाराज़ है इस दौरे-हाज़िर से
जिसे भी देखिये नाराज़ है इस दौरे-हाज़िर से
मगर इस दौरे-हाज़िर से बगावत कौन करता है
बना लेते हैं अपनी-अपनी जन्नत को सभी दोज़ख़
मगर दोज़ख़ से पैदा अपनी जन्नत कौन करता है
कोई दैरो-हरम में जाये या बाहर रहे उनसे
उसे मालूम है उसकी इबादत कौन करता है
खुदा का घर बचाने के लिए लड़ते हैं सब लेकिन
जो घर बन्दों के हैं उनकी हिफ़ाज़त कौन करता है
मगर इस दौरे-हाज़िर से बगावत कौन करता है
बना लेते हैं अपनी-अपनी जन्नत को सभी दोज़ख़
मगर दोज़ख़ से पैदा अपनी जन्नत कौन करता है
कोई दैरो-हरम में जाये या बाहर रहे उनसे
उसे मालूम है उसकी इबादत कौन करता है
खुदा का घर बचाने के लिए लड़ते हैं सब लेकिन
जो घर बन्दों के हैं उनकी हिफ़ाज़त कौन करता है
आंसू
आंसू
आंसुओं से मिरी तहरीर नहीं मिट सकती
कोई कागज़ हूँ कि पानी से डराता है मुझे
दूध पीते हुए बच्चे की तरह है दिल भी
दिन में सो जाता है रातों में जगाता है मुझे
सर पे सूरज की सवारी मुझे मंज़ूर नहीं
अपना कद धूप में छोटा नज़र आता है मुझे
बशीर बद्र
आंसुओं से मिरी तहरीर नहीं मिट सकती
कोई कागज़ हूँ कि पानी से डराता है मुझे
दूध पीते हुए बच्चे की तरह है दिल भी
दिन में सो जाता है रातों में जगाता है मुझे
सर पे सूरज की सवारी मुझे मंज़ूर नहीं
अपना कद धूप में छोटा नज़र आता है मुझे
बशीर बद्र
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Tuesday, December 27, 2011
शहीदों की चिताओं पर/जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’
उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा
चखाएँगे मज़ा बर्बादिए गुलशन का गुलचीं को
बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा
ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजरे क़ातिल
पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़
न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा
वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है
सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा
कभी वह दिन भी आयेगा जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी जब अपना आसमां होगा......
Friday, December 23, 2011
आग की भीख
धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।
मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।
मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।
- दिनकर
Sunday, December 18, 2011
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! -हरिवंश राय 'बच्चन'
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! -हरिवंश राय 'बच्चन'
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अब तो पथ यही है |
जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है|
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |(दुष्यंत कुमार)
अब तो पथ यही है|
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है|
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |(दुष्यंत कुमार)
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साथी, सब कुछ सहना होगा!
मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!–हरिवंश राय बच्चन
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!–हरिवंश राय बच्चन
पथ की पहचान
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।
पुस्तकों में है नहीं
छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की जबानी
छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की जबानी
अनगिनत राही गए
इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी
इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी
यह निशानी मूक होकर
भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।
भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।
यह बुरा है या कि अच्छा
व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना
व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना
तू इसे अच्छा समझ
यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना
यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना
हर सफल पंथी यही
विश्वास ले इस पर बढ़ा है
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
विश्वास ले इस पर बढ़ा है
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।
है अनिश्चित किस जगह पर
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे
किस जगह यात्रा खतम हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे
कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।-हरिवंश राय बच्चन
Sunday, December 11, 2011
और भी दूँ / रामावतार त्यागी
मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
मॉं तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल में जब भी,
कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण।
गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
मॉंज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बॉंध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।
स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गॉंव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्वज को थमा दो।
सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। साभार कविताकोश, एक ऐसी जगह जिसके बिना मुझे दिन अधूरा लगता है.
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Saturday, December 10, 2011
एक भी आँसू न कर बेकार /रामावतार त्यागी
एक भी आँसू न कर बेकार
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!
पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाय!
चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं
हर छलकते अश्रु को कर प्यार
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!
व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!
पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाय!
चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं
हर छलकते अश्रु को कर प्यार
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!
व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!
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