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Friday, January 20, 2012

जिंदगी थक गई मौत चलती रही- गोपाल दास नीरज


एक दिन देखता हूँ की रूठी हुई, चांदनी चन्द्रमा से खड़ी दूर है
एक दिन ये सुना फूल की चोट से, एक पाषाण का दिल हुआ चूर है
एक दिन आंसुओं ने कहा आँख से, रो ना हम आयेंगे कल बदल कर कफ़न
एक दिन एक बोला शलभ दीप से, चूम लूं मैं तुझे तब मुझे कर दफ़न
पर सुनी अनसुनी बात ऐसी हुई, रूठ सोया शलभ लौ मचलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन एक तारा गिरा टूट कर, एक उजड़े हुए नींद ने रख लिया
फूल ने तभी मुस्कुरा कर कहा, ये बुझा है दिया क्यों इसे दिल दिया
बोलने तब लगा नींद का एक त्रिण, हर दुखी को दुखी से सदा प्यार है
आंसुओं के लिए गोद बस धूल है, फूल को तो धरे शीश संसार है
किन्तु झगडा हुआ इस तरह ये ख़तम, फूल झड़ता रहा धूल खिलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन कह रही थी भ्रमर से कली, होंठ जूठे किये हैं मुझे तू न छू
कह रहा था भ्रमर सुन अरी बावली, निष्कलुष मैं बनू ले मुझे चूम तू
आ गया एक झोंका तभी उस तरफ, हिल उठी डाल तो भू-गगन हिल गए
कुनमुनाई लजाई कली तो बहुत, आप ही आप लेकिन अधर मिल गए
अंत ऐसे हुआ उस मिलन का मगर, दिन सिसकता रहा रात ढलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक दिन ज़िंदगी की कड़ी धूप मे, दो पखेरू मिले मुक्त नभ के तले
कुछ ना बोले ना डोले ना कुछ बात की, हो गया प्यार लेकिन नयन जब मिले
होंठ ज्यों ही उठे तो नियती हंस पड़ी, आँधियाँ चल पड़ी तम बरसने लगा
छूट गया हाथ से हाथ भीगा हुआ, गालियाँ मार संसार हँसने लगा
और फिर यूँ कटी विरह की निशा, स्नेह बुझता रहा रात जलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
एक ऐसी हंसी हंस पड़ी धूल यह लाश इंसान की मुस्कुराने लगी
तान ऐसी किसी ने कहीं छेड़ दी आँख रोती हुई गीत गाने लगी
एक ऐसी किरण छू गई देह मे खुद-ब-खुद प्राण का दीप जलने लगा
एक आवाज़ आई किसी ओर से हर मुसाफिर बिना पाँव चलने लगा
बस इसी ताल पर उम्र की बांसुरी गीत गुनती रही सुर बदलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही
इस तरह तय हुआ साँस का ये सफ़र, जिंदगी थक गई मौत चलती रही