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Saturday, January 14, 2012

भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.

भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.
एक देश है, हजारों भाषा,
हजारों जाति और अनेक धर्म.
उबलता है देश सारा, के भारत नहीं है हमारा.
उबलते हैं सभी धर्म, के भारत नहीं है हमारा.

एक धर्म है हमारा, जो रखे देश को एक,
इस देश के भ्रष्ट लोग न पूछे कोई जाति,
बस हाथ फैलाकर करते स्वागत, हो कोई भी धर्म,
हमको पैसा देदो भाई, भले हो आपका कोई भी मर्म.

भारत एक है जब सामने आवे भ्रष्टाचार,
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी एक साथ करें गुणगान,
हमारे सपने को भी कभी मिलेगा आकार,
बने भारत का एक नया ही राष्ट्रगान,
"भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं,
कई धर्म हैं कई भाषा, होती हैं कई जाति भी,
एकता और अखंडता को एकजुट रखने में हम सब एक हैं,
जब तक जेब में आते नोट, भारत एक है.
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं."----रविन्द्र 

Saturday, January 7, 2012

तलाश

इक आह सी दिल में उठती है, इक दर्द जिगर में उठता है,
हम रात में उठके रोते हैं, जब सारा ज़माना सोता है.

ये मेरा जीवन है, जो जाने मुझ से क्या चाहता है.

 दिन होता है तो कुछ और तलाश होती है, रात होती है तो कुछ और तलाश होती है.
 जब चलते हैं तो इक मंजिल की और मंजिल पे किसी राह की तलाश होती है. 
करना क्या चाहते हैं ये तो पता नहीं, पर जाने किस पते की तलाश होती है.
 चलते चलते जो मिले रह गुज़र, तो रास्ता ठीक से निकल गया, 
वरना तो रास्ते में हर रोज इक रह गुजर की तलाश होती है. 
तलाश करते करते ये जिंदगी इक तलाश बन गयी है, पर फिर भी इस तलाश में इक जिंदगी की तलाश होती है. 
इक अजीब सी उलझन में फंसी है जिंदगानी, पर इस उलझन में भी एक रास्ते की तलाश होती है.
इक रब के दीदार से ये तलाश कहाँ पूरी हुई, जो इक रब के बाद दूसरे रब की तलाश होती है.

रविन्द्र सिंह ढुल/ ०७.०१.२०१२/जींद

Tuesday, December 27, 2011

पास खडा था भ्रष्टाचार

सुबह उठ कर आँख खुली तो पास खडा था भ्रष्टाचार,
अट्टहास लगाता हुआ, प्रश्न चिह्न लगाता हुआ.

जब पूछा मैंने, तुझमें इतने प्राण कहाँ से आये,
के तुम बिन पूछे, बिन बताए मेरे घर भी दौड़ आये.

हंसता हुआ, वो बोला, तुम शायद अवगत नहीं,
कल रात ही संसद में मुझे जीवनदान मिला है.

देश शायद सो रहा था, दिवा स्वप्न के बीज अपने घर में बो रहा था,
इतने में एक कानून आया, जिसने भ्रष्टाचार को मिटाने का संकल्प दोहराया.

बस उस कानून से मुझे जीवन दान मिला है, 
अब तक तो मैं सिर्फ घर के बाहर सड़क पर, दफ्तरों में पाया जाता था,
अब मैं घर में, आपके साथ खड़ा,
अट्टहास करूँगा, आपकी बेचैनी पर,
मेरा जीवन हरण करने चला था जो चौकीदार,
उसे ही रिश्वत से मैंने अपने साथ मिला लिया......रविन्द्र सिंह ढुल/२८.१२.२०११ 

Saturday, December 24, 2011

उठो धरा के अमर सपूतो

उठो धरा के अमर सपूतो
पुनः नया निर्माण करो ।
जन-जन के जीवन में फिर से
नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ।

नया प्रात है, नई बात है,
नई किरण है, ज्योति नई ।
नई उमंगें, नई तरंगे,
नई आस है, साँस नई ।
युग-युग के मुरझे सुमनों में,
नई-नई मुसकान भरो ।

डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं ।
गुन-गुन-गुन-गुन करते भौंरे
मस्त हुए मँडराते हैं ।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नवगान भरो ।

कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है ।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है ।
नूतन मंगलमयी ध्वनियों से
गुंजित जग-उद्यान करो ।

सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है ।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है ।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो ।

उठो धरा के अमर सपूतो,
पुनः नया निर्माण करो ।द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

Friday, October 28, 2011

प्रयास

कुछ व्यक्तियों का सोचना रहता है कि क्यों इतना ज्ञान देने का निरर्थक प्रयास मैं करता रहता हूँ. इसका उत्तर ऋग्वेद में दिया है "वदन् ब्रःमावदतो वनीयान. ( १०.११७.७ ). अर्थात उपदेश देने वाला विद्वान् चुप रहने वाले से श्रेष्ट है. अपने भावों को व्यक्त करना कहीं भी बुरा नहीं कहा जा सकता. उस से प्रभावित होना या न होना पढने या सुनने वाले का नीहित अधिकार है. यदि किसी महत्वपूर्ण विषय पर टिप्पणी से किसी व्यक्ति को दिशा मिलती है तो यह प्रयास सार्थक ही कहा जाएगा. भले ही अपने आप को विद्वान् समझना थोड़ा अधिक है अपितु फिर भी पढ़ा लिखा होने का गौरव तो मुझे प्राप्त है ही.अतः मैं प्रयास करता रहूँगा. उसे सार्थक या निरर्थक समझना दूसरों का कार्य है.