Wednesday, September 18, 2013

दायी है कौन विपद का

हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?
यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?
दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।
पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।
घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।
जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।
चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;
यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।
है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?
किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?
जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,
दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है।
नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।
जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है;
है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं।
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।
तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में,
किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।
पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?
तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।
जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा,
शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।
हम पर अपने पापों का बोझ न डालें,
कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें।
कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।
हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,है
कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?
हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !
जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें
मारेगा,अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।
"

Sunday, September 15, 2013

अकबर-बीरबल/लोग एक जैसा भी सोचते हैं

बादशाह अकबर और उनके दरबारी एक प्रश्न पर विचार कर रहे थे जो राज-काज चलाने की दृष्टि से बेहद अहम न था। सभी एक-एक कर अपनी राय दे रहे थे। बादशाह दरबार में बैठे यह महसूस कर रहे थे कि सबकी राय अलग है। उन्हें आश्चर्य हुआ कि सभी एक जैसे क्यों नहीं सोचते !

तब अकबर ने बीरबल से पूछा, ‘‘क्या तुम बता सकते हो कि लोगों की राय आपस में मिलती क्यों नहीं ? सब अलग-अलग क्यों सोचते हैं ?’’

‘‘हमेशा ऐसा नहीं होता, बादशाह सलामत !’’ बीरबल बोला, ‘‘कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं जिन पर सभी के विचार समान होते हैं।’’ इसके बाद कुछ और काम निपटा कर दरबार की कार्यवाही समाप्त हो गई। सभी अपने-अपने घरों को लौट चले।

उसी शाम जब बीरबल और अकबर बाग में टहल रहे थे तो बादशाह ने फिर वही राग छेड़ दिया और बीरबल से बहस करने लगे।

तब बीरबल बाग के ही एक कोने की ओर उंगली से संकेत करता हुआ बोला, ‘‘वहां उस पेड़ के निकट एक कुआं है। वहां चलिए, मैं कोशिश करता हूं कि आपको समझा सकूं कि जब कोई समस्या जनता से जुड़ी हो तो सभी एक जैसा ही सोचते हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनको लेकर लोगों के विचार एक जैसे होते हैं।’’

अकबर ने कुछ देर कुंए की ओर घूरा, फिर बोले, ‘‘लेकिन मैं कुछ समझा नहीं, तुम्हारे समझाने का ढंग कुछ अजीब सा है।’’ बादशाह जबकि जानते थे कि बीरबल अपनी बात सिद्ध करने के लिए ऐसे ही प्रयोग करता रहता है।

‘‘सब समझ जाएंगे हुजूर !’’ बीरबल बोला, ‘‘आप शाही फरमान जारी कराएं कि नगर के हर घर से एक लोटा दूध लाकर बाग में स्थित इस कुएं में डाला जाए। दिन पूर्णमासी का होगा। हमारा नगर बहुत बड़ा है, यदि हर घर से एक लोटा दूध इस कुएं में पड़ेगा तो यह दूध से भर जाएगा।’’

बीरबल की यह बात सुन अकबर ठहाका लगाकर हंस पड़े। फिर भी उन्होंने बीरबल के कहेनुसार फरमान जारी कर दिया।

शहर भर में मुनादी करवा दी गई कि आने वाली पूर्णमासी के दिन हर घर से एक लोटा दूध लाकर शाही बाग के कुएं में डाला जाए। जो ऐसा नहीं करेगा उसे सजा मिलेगी।

पूर्णमासी के दिन बाग के बाहर लोगों की कतार लग गई। इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा था कि हर घर से कोई न कोई वहां जरूर आए। सभी के हाथों में भरे हुए पात्र (बरतन) दिखाई दे रहे थे।

बादशाह अकबर और बीरबल दूर बैठे यह सब देख रहे थे और एक-दूसरे को देख मुस्करा रहे थे। सांझ ढलने से पहले कुएं में दूध डालने का काम पूरा हो गया हर घर से दूध लाकर कुएं में डाला गया था। जब सभी वहां से चले गए तो अकबर व बीरबल ने कुएं के निकट जाकर अंदर झांका। कुआं मुंडेर तक भरा हुआ था। लेकिन यह देख अकबर को बेहद हैरानी हुई कि कुएं में दूध नहीं पानी भरा हुआ था। दूध का तो कहीं नामोनिशान तक न था।

हैरानी भरी निगाहों से अकबर ने बीरबल की ओर देखते हुए पूछा, ‘‘ऐसा क्यों हुआ ? शाही फरमान तो कुएं में दूध डालने का जारी हुआ था, यह पानी कहां से आया ? लोगों ने दूध क्यों नहीं डाला ?’’

बीरबल एक जोरदार ठहाका लगाता हुआ बोला, ‘‘यही तो मैं सिद्ध करना चाहता था हुजूर ! मैंने कहा था आपसे कि बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जिस पर लोग एक जैसा सोचते हैं, और यह भी एक ऐसा ही मौका था। लोग कीमती दूध बरबाद करने को तैयार न थे। वे जानते थे कि कुएं में दूध डालना व्यर्थ है। इससे उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं था। इसलिए यह सोचकर कि किसी को क्या पता चलेगा, सभी पानी से भरे बरतन ले आए और कुएं में उड़ेल दिए। नतीजा…दूध के बजाय पानी से भर गया कुआं।’’

बीरबल की यह चतुराई देख अकबर ने उसकी पीठ थपथपाई।
बीरबल ने सिद्ध कर दिखाया था कि कभी-कभी लोग एक जैसा भी सोचते हैं।

Sunday, August 18, 2013

भारत

अपना भारत वो भारत है जिसके पीछे संसार चला।  आज बड़े दिन के बाद पूर्व और पश्चिम का यह गीत सुना।  हम कहाँ थे और कहाँ पंहुच गए! भारत अर्थात आर्यावर्त; न केवल इसकी भाषा अपितु इसकी संस्कृति, वेशभूषा, धर्म, मान्यताएं और यहाँ तक कि नागरिक भी एक गंभीर खतरे से रूबरू हैं और इसे कोई भी नहीं समझ पा रहा। मान्यताओं को खंडित करने में यदि किसी को नोबल मिलना चाहिए तो वे हैं भारतवर्ष के नागरिक।  ऐसा नहीं है कि भारत वर्ष में सब बुरा ही बुरा रहा है।  इस महान गीत को सुनते हुए यह ब्लॉग लिख रहा हूँ और मुझे पूरी तरह से एहसास है कि भारत महान था और बन भी सकता है।  जरूरत है तो बस उस इमानदारी की जिसके कारण भारत वर्ष के प्रधानमन्त्री (चाणक्य) एक झोंपड़ी में रह कर स्वयं के तेल से अपने मेहमानों के साथ चर्चा करते थे।  ऐसा सोचना ही बेमानी है कि हम बिलकुल सही थे; पर आवश्यकता है हमें अपने अन्दर उस इमानदारी को विकसित करने का जिस इमानदारी में हम अपनी गलती को स्वीकार कर उसे सही करने का प्रयास करें।

भगवान् करे ये और फले; बढ़ता ही रहे और फूले फले। मेरे जैसे इंसान रहें या न रहे इस राष्ट्र की श्रेष्टता के लिए लोग आगे आते रहेंगे और कोई छोटा सा ही सही पर प्रयास करते रहेंगे। इन प्रयासों से ही हम अपने शीर्ष गौरव को प्राप्त कर पायेंगे।

ज्यादा लिख नहीं पाऊंगा। शुभ रात्रि ; जय हिन्द।

Saturday, August 17, 2013

जियो जियो अय हिंदुस्तान- श्री रामधारी सिंह दिनकर

जाग रहे हम वीर जवान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान !
हम प्रभात की नई किरण हैं, हम दिन के आलोक नवल,
हम नवीन भारत के सैनिक, धीर,वीर,गंभीर, अचल ।
हम प्रहरी उँचे हिमाद्रि के, सुरभि स्वर्ग की लेते हैं ।
हम हैं शान्तिदूत धरणी के, छाँह सभी को देते हैं।
वीर-प्रसू माँ की आँखों के हम नवीन उजियाले हैं
गंगा, यमुना, हिन्द महासागर के हम रखवाले हैं।
तन मन धन तुम पर कुर्बान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान !

 

हम सपूत उनके जो नर थे अनल और मधु मिश्रण,
जिसमें नर का तेज प्रखर था, भीतर था नारी का मन !
एक नयन संजीवन जिनका, एक नयन था हालाहल,
जितना कठिन खड्ग था कर में उतना ही अंतर कोमल।
थर-थर तीनों लोक काँपते थे जिनकी ललकारों पर,
स्वर्ग नाचता था रण में जिनकी पवित्र तलवारों पर
हम उन वीरों की सन्तान ,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान !

 

हम शकारि विक्रमादित्य हैं अरिदल को दलनेवाले,
रण में ज़मीं नहीं, दुश्मन की लाशों पर चलनेंवाले।
हम अर्जुन, हम भीम, शान्ति के लिये जगत में जीते हैं
मगर, शत्रु हठ करे अगर तो, लहू वक्ष का पीते हैं।
हम हैं शिवा-प्रताप रोटियाँ भले घास की खाएंगे,
मगर, किसी ज़ुल्मी के आगे मस्तक नहीं झुकायेंगे।
देंगे जान , नहीं ईमान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान।

 

जियो, जियो अय देश! कि पहरे पर ही जगे हुए हैं हम।
वन, पर्वत, हर तरफ़ चौकसी में ही लगे हुए हैं हम।
हिन्द-सिन्धु की कसम, कौन इस पर जहाज ला सकता ।
सरहद के भीतर कोई दुश्मन कैसे आ सकता है ?
पर की हम कुछ नहीं चाहते, अपनी किन्तु बचायेंगे,
जिसकी उँगली उठी उसे हम यमपुर को पहुँचायेंगे।
हम प्रहरी यमराज समान
जियो जियो अय हिन्दुस्तान!

Friday, August 16, 2013

धर्म समन्वय के ऊपर स्वामी विवेकानंद जी के कुछ विचार

 "संसार के लिए यह बड़े ही दुर्भाग्य की  बात होगी यदि सभी मनुष्य एक ही धर्म, उपासना की एक ही पद्यति और नैतिकता के एक ही आदर्श को स्वीकार कर लें।  इससे सभी धार्मिक और आद्यात्मिक उन्नति को मृत्यु जैसा आघात पंहुचेगा।  "

दूसरे धर्म या मत के लिए हमें केवल सहनशीलता नहीं दिखानी है; बल्कि प्रत्यक्ष रूप से उन्हें स्वीकार करना होगा; और यही सत्य सब धर्मों की नींव है। "

"साधुता, पवित्रता और सेवा किसी सम्प्रदाय विशेष की संपत्ति नहीं है; और प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ट तथा अतिशय उन्नत चरित्र के नर-नारियों को जन्म दिया है।  इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्य सारे धर्म नष्ट हो जाएँ और केवल उसी का धर्म जीवित रहेगा, तो मैं अपने हृदय के अन्तस्तल से उस पर दया करता हूँ और उसे स्पष्ट बता देना चाहता हूँ कि सारे प्रतिरोधों के बावजूद, शीघ्र ही प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा होगा-संघर्ष नहीं सहयोग; पर भाव-विनाश नहीं पर भाव ग्रहण, मतभेद और कलह नहीं, समन्वय और शान्ति। "

***

कल कुछ और विचार प्रस्तुत करूंगा।

Tuesday, August 13, 2013

विडम्बना

यतो धर्मस्ततो जयः, अर्थात जहाँ धर्म है वहां जय है। हिन्दू धर्म का यह महान सन्देश कहीं गुम हो गया लगता है।  आज गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती है, उन्होंने अपने महान काव्य में कहा था," परहित सरसी धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई" अर्थात दूसरे के हित से बड़ा धर्म नहीं है एवं दूसरे को पीड़ा देने से अधिक अधर्म का कोई कार्य नहीं है।  जब मैं भारतवर्ष के पिछले तीस  देखता हूँ तो वह सम्पूर्ण रूप से अधर्म से भरे हैं।  किसी भी धर्म ने अन्य धर्म को पीड़ा देने से गुरेज नहीं किया; हालांकि यह अवश्य सत्य है कि बहुसंख्यकों ने अल्पसंख्यकों का अधिकतर जगह पर ध्यान रखा है (एक दो अपवादों को छोड़ कर ) पर फिर भी भारतवर्ष ने अपने एक विशेष चरित्र की हत्या कर दी है; वह है हर स्थिति एवं हर परिस्थिति में अपने धर्म का पालन। अधर्म ने यहाँ इस हद तक घर कर लिया है कि सभी मन्त्र, श्लोक, मान्यताएं एवं दोहे फेल हो गए लगते हैं।  चाहे साम्प्रदायिकता हो या धर्मनिरपेक्षता हो; हर जगह हम दोहरा चरित्र रखते हैं।

Monday, June 24, 2013

विचार

कोई भी धर्म हिंसा, घृणा, वैर नहीं फैला सकता। यदि वह ऐसा करता है तो उस धर्म का प्रचारक पाखंडी एवं झूठा है। अब यह सोचने वाली बात है कि मैंने धर्म प्रचारकों को पाखंडी कहा; धर्म को नहीं।
धर्म मेरे किसी विचार से एवं किसी एक मनुष्य से कहीं महान हैं। धर्म चाहे कोई भी हो, पृथ्वी के किसी भी कोने में क्यों न हो, सच्चा होगा, धर्म को झूठा बताने वाला गलत हो सकता है पर धर्म नहीं। धर्म किसी भी व्यक्ति की आस्था का केंद्र है; उसका विशवास है; उसका चरित्र है; उसकी नैतिकता है। नैतिक जीवन जीने वाला किसी एक पाखंडी साधू से अधिक धार्मिक है जो जाप तो हर रोज करता है पर हृदय में श्रद्धा नहीं रखता।
संस्कृत में एक श्लोक है"यतो धर्मस्ततो जयः" अर्थात जहाँ धर्म है; वहीँ विजय है। मैं अपने आपको एक हिन्दू धर्म के साथ जुडा मानकर उस ईश का अपमान क्यों करून जिसने हमें उत्पन्न किया है; यदि मुझे मुस्लिम धर्म समर्पण करना सिखाता है; इसाई धर्म सामान्य नैतिकता सिखाता है; सिख धर्म सेवा सिखाता है तो केवल हिन्दू धर्म से शिक्षा ग्रहण करके मैं उन धर्मात्माओं का अपमान नहीं कर सकता जिन्होंने इन महान विचारधाराओं को प्रतिपादित किया है। हालांकि यह भी उतना ही सच है की वे लोग किसी भी मान या अपमान से परे हैं और  महान हैं कि मेरी प्रशंसा या मेरी आलोचना उन्हें छू भी न पाएगी।
कल कुछ और लिखूंगा; तब तक के लिए शुभ रात्रि-रविन्द्र