Friday, January 23, 2015

साधक बोलो दुर्गम पथ पर

साधक बोलो दुर्गम पथ पर तुम न चलोगे कौन चलेगा?
कदम कदम पर बिछे हुए है, तीखे तीखे कंकर कंटक।
भ्रांत भयानक पूर्वाग्रह है, और फिरते हैं वंचक।
पर साथी इन बाधाओ को तुम न दलोगे कौन दलेगा?
अम्बर में सघनघन का, कोई भी आसार नहीं है।
उष्ण पवन है तप्त धरा है, कोई भी उपचार नहीं है।
इस विकट वेला में तरूवर, तुम न फलोगे कौन फलेगा?
सूरज कब का डूब चला है, रह गया अज्ञान अकेला।
चारो ओर घोर तिमिर है, और निकट तूफानी बेला।
फिर भी इस रजनी में दीपक, तुम न जलोगे कौन जलेगा?

Sunday, December 14, 2014

न हो साथ कोई

न हो साथ कोई अकेले बढ़ो तुम
सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी।
सदा जो जगाये बिना ही जगा है
अँधेरा उसे देखकर ही भगा है।
वही बीज पनपा पनपना जिसे था
घुना क्या किसी के उगाये उगा है
अगर उग सको तो उगो सूर्य से तुम
प्रखरता तुम्हारे चरण चूम लेगी॥
सही राह को छोड़कर जो मुड़े
वही देखकर दूसरों को कुढ़े हैं।
बिना पंख तौले उड़े जो गगन में
न सम्बन्ध उनके गगन से जुड़े हैं
अगर बन सको तो पखेरु बनो तुम
प्रवरता तुम्हारे चरण चूम लेगी॥
न जो बर्फ की आँधियों से लड़े हैं
कभी पग न उसके शिखर पर पड़े हैं।
जिन्हें लक्ष्य से कम अधिक प्यार खुद से
वही जी चुराकर तरसते खड़े हैं।
अगर जी सको तो जियो जूझकर तुम
अमरता तुम्हारे चरण चूम लेगी॥

Saturday, November 22, 2014

तुमसे दूर जाने की


मैनें कई बार 
कोशिश की है
तुम से दूर जानें की,
लेकिन 
मीलों चलनें के बाद
जब मुड़ कर देखता हूँ
तो तुम्हें 
उतना ही करीब पाता
हूँ |

तुम्हारे इर्द
गिर्द 
वृत्त की
परिधि बन कर रह गया
हूँ मैं ।

कवि अज्ञात 


Tuesday, November 11, 2014

जीवन की विशिष्टता

हमारे जीवन की विशिष्टता इस बात में है कि हम असंभव एवं मुश्किल परिस्थितियां का सामना किस प्रकार करते हैं। लघु बुद्धि वाला मनुष्य स्वयं को इस प्रकार की परिस्थितियों में समाप्त कर लेता है तथा स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य इस प्रकार की परिस्थितियों  में स्वयं को संयमित रख जीवन यापन करता है। कहते हैं यदि रास्ता मुश्किल हो तो वह हमेशा सुन्दर मंजिलों की तऱफ ले जाता है अतः आवश्यक है कि इस प्रकार के समय को हम संयमित करके निकलें।हर मुश्किल परिस्थिति हमें कुछ सिखाने आती है तथा साथ में लाती है बहुत से नव संघर्ष जो हम उन परिस्थितियों का सामना करने के बाद करते हैं।  स्थिर एवं विवेकशील बुद्धि का व्यक्ति सभी प्रकार की परिस्थितियों का समभाव से सामना कर आगे बढ़ता है।  न केवल हमें आगे  बढ़ने की आवश्यकता है ;अपितु आवश्यकता है कि हम आगे बढ़ते हुए अपनी बुद्धि को स्थिर रखें। 

याद है/ Unknown Author

याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,
सड़्क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब
चलते चलते
थक जाता था
तुम कहती थीं ,
बस
उस अगले खम्भे
तक और ।

आज
मैं अकेला ही
उस सड़्क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब
निगाह से
देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता
पूछ रहे हैं
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद
अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा
इन्तजार कर रही हो !

Wednesday, October 22, 2014

ज्ञान असत्य है

समस्त ज्ञान असत्य है एवं समस्त सत्य ज्ञान का स्वरुप है। समस्त सांसारिक ज्ञान केवल मात्र तर्क की शक्ति पर टिका है एवं जब तक  वह तर्क की सीमा को पार नहीं कर देता उसे संसार ज्ञान की श्रेणी में नहीं रखता। श्री रामकृष्ण परमहँस कहते हैं कि ज्ञान विश्वास से पैदा होता है न कि तर्क से। प्रथम आपकी बुद्धि स्वीकार करेगी उस उस अनजान को उसके बाद ही ज्ञान पैदा होगा एवं जन्म लेगा। यदि बुद्धि स्वीकार करने की स्थिति में होगी ही नहीं तो ज्ञान आ ही नहीं सकता। साकार ब्रह्म अथवा निराकार ब्रह्म दोनों ही उस ज्ञान के स्वरूप हैं। श्री परमहँस भी उस ज्ञान से जन्म लेते हैं तथा श्री दयानंद भी। जहाँ एक ओर हजरत मोहम्मद उस ही ज्ञान से जन्म लेते हैं तो दूसरी ओर ओशो भी उस ज्ञान का स्वरुप मात्र है। यदि हम इन परस्पर विरोधाभासी महापुरुषों को एक तर्क की श्रेणी में रखेंगे तो हम समझ पाएंगे कि सभी का  ज्ञान अधूरा है। वहीँ दूसरी ओर यदि किसी एक के ऊपर दृढ विश्वास किया जाए तो सभी पूर्ण हैं। अतः स्पष्ट है कि विश्वास कीजिये  कि तर्क के परे झाँका जा सकता है। माँ भारती आप सबका मार्ग प्रशस्त करे।

रविन्द्र सिंह ढुल  

Monday, September 8, 2014

अकेला चलना क्यों इतना महत्त्वपूर्ण

अकेला चलना क्यों इतना महत्त्वपूर्ण है यह इस बात से साबित होता है कि न केवल आप इस जीवन में अकेले आते हैं ; अपितु आपकी अंतिम यात्रा भी अकेली ही रहती है। श्री कृष्ण गीता के सन्देश में केवल इतना ही कहते हैं कि हे पार्थ तूँ मुझमें है और मैं तुझमें। अन्य किसी और के बारे में मत सोच। मैं ही तेरा एक मात्र सच्चा साथी हूँ। ये युद्ध के मैदान में जो तेरे संगी साथी खड़े हैं ये कभी तेरे थे ही नहीं जो तूँ इनके लिए इतना शोकग्रस्त है। ऐसा कोई समय नहीं था जब तुम नहीं थे अथवा मैं नहीं था अथवा ये तुम्हारे संगी साथी नहीं थे। ऐसा कोई समय नहीं होगा जब ये नहीं होंगे। तो इनके लिए शौक ग्रस्त मत हो एवं स्वयं का कर्म कर। कर्म करते वक्त फल की इच्छा भी मत कर। केवल मात्र कर्म कर एवं उसे मुझे अर्पित कर। ऐसे भक्त जो कर्म कर उसे मुझे समर्पित कर देते हैं मैं उनके योगक्षेम का वहन करता हूँ। यह संदेश कृष्ण ने केवल अर्जुन को अपना शिष्य एवं सखा मान दिया। यदि कृष्ण चाहते तो वह देववाणी समस्त युद्ध मैदान में सुनाई देती। पर श्री कृष्ण ने अकेले अर्जुन को यह सन्देश दे स्पष्ट कर दिया कि अर्जुन का युद्ध केवल मात्र अर्जुन लड़ रहा था तथा कृष्ण उसके सारथी थे। भीम स्वयं का युद्ध लड़ रहा था इस ही प्रकार सभी पात्र स्वयं के लिए लड़ रहे थे।

हम आराम से समझ सकते हैं कि अकेला रहना एवं चलना बेहद महत्त्वपूर्ण है।