कोई
भी धर्म हिंसा, घृणा, वैर नहीं फैला सकता। यदि वह ऐसा करता है तो उस धर्म
का प्रचारक पाखंडी एवं झूठा है। अब यह सोचने वाली बात है कि मैंने धर्म
प्रचारकों को पाखंडी कहा; धर्म को नहीं।
पथ उस राही का जिसे न मंजिल पता है और न ही राह। उसे बस चलना आता है। राही को साथ ले भी और अकेले भी।
Monday, June 24, 2013
विचार
Friday, May 17, 2013
वो जिसके हाथ में छाले हैं
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बँगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है/अदम गोंडवी
उसी के दम से रौनक आपके बँगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है/अदम गोंडवी
मेरा एक जीवन है
मेरा एक जीवन है
उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं
उसमें कोई मेरा अनन्यतम भी है
पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूँ
जिस नगर के गलियारों, फुटपाथ, मैदानों में घूमा हूँ
हँसा खेला हूँ
उसके अनेक हैं नागर, सेठ, म्युनिस्पलम कमिश्नर, नेता
और सैलानी, शतरंजबाज और आवारे
पर मैं इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूँ
देह पर जो लता-सी लिपटी
आँखों में जिसने कामना से निहारा
दुख में जो साथ आए
अपने वक्त पर जिन्होंने पुकारा
जिनके विश्वास पर वचन दिए, पालन किया
जिनका अंतरंग हो कर उनके किसी भी क्षण में मैं जिया
वे सब सुहृद हैं, सर्वत्र हैं, सर्वदा हैं
पर मैं अकेला हूँ
सारे संसार में फैल जाएगा एक दिन मेरा संसार
सभी मुझे करेंगे - दो चार को छोड़ - कभी न कभी प्यार
मेरे सृजन, कर्म-कर्तव्य, मेरे आश्वासन, मेरी स्थापनाएँ
और मेरे उपार्जन, दान-व्यय, मेरे उधार
एक दिन मेरे जीवन को छा लेंगे - ये मेरे महत्व
डूब जाएगा तंत्रीनाद कवित्त रस में, राग में रंग में
मेरा यह ममत्व
जिससे मैं जीवित हूँ
मुझ परितप्त को तब आ कर वरेगी मृत्यु - मैं प्रतिकृत हूँ
पर मैं फिर भी जियुँगा
इसी नगरी में रहूँगा
रूखी रोटी खाउँगा और ठंड़ा पानी पियूँगा
क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूँ/रघुवीर सहाय
उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं
उसमें कोई मेरा अनन्यतम भी है
पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूँ
जिस नगर के गलियारों, फुटपाथ, मैदानों में घूमा हूँ
हँसा खेला हूँ
उसके अनेक हैं नागर, सेठ, म्युनिस्पलम कमिश्नर, नेता
और सैलानी, शतरंजबाज और आवारे
पर मैं इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूँ
देह पर जो लता-सी लिपटी
आँखों में जिसने कामना से निहारा
दुख में जो साथ आए
अपने वक्त पर जिन्होंने पुकारा
जिनके विश्वास पर वचन दिए, पालन किया
जिनका अंतरंग हो कर उनके किसी भी क्षण में मैं जिया
वे सब सुहृद हैं, सर्वत्र हैं, सर्वदा हैं
पर मैं अकेला हूँ
सारे संसार में फैल जाएगा एक दिन मेरा संसार
सभी मुझे करेंगे - दो चार को छोड़ - कभी न कभी प्यार
मेरे सृजन, कर्म-कर्तव्य, मेरे आश्वासन, मेरी स्थापनाएँ
और मेरे उपार्जन, दान-व्यय, मेरे उधार
एक दिन मेरे जीवन को छा लेंगे - ये मेरे महत्व
डूब जाएगा तंत्रीनाद कवित्त रस में, राग में रंग में
मेरा यह ममत्व
जिससे मैं जीवित हूँ
मुझ परितप्त को तब आ कर वरेगी मृत्यु - मैं प्रतिकृत हूँ
पर मैं फिर भी जियुँगा
इसी नगरी में रहूँगा
रूखी रोटी खाउँगा और ठंड़ा पानी पियूँगा
क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूँ/रघुवीर सहाय
Sunday, March 17, 2013
"एक
और नया भारत कहता है कि पाश्चात्य भाव, भाषा, खान-पान और वेश भूषा का
अवलंबन करने से ही हम लोग पाश्चात्य शक्तियों की भांति शक्तिमान हो सकेंगे।
दूसरी और प्राचीन भारत कहता है कि मूर्ख!नक़ल करने से कहीं दूसरों का भाव
अपना हुआ है? बिना उपार्जन किये कोई वास्तु अपनी नहीं होती। क्या सिंह की
खाल पहन कर गधा कहीं सिंह हुआ है?
--
Saturday, March 16, 2013
"यथा खरः चन्दन, भारवाही भारस्य वेत्ता न तु
चन्दनस्य।" अर्थात चन्दन की लकडियाँ ढोने वाला गधा, उसके मूल्य को नहीं
केवल उसके बोझ को समझ सकता है।
Friday, March 15, 2013
स्वतंत्रता और परतंत्रता में जो फर्क है वह है "स्व" एवं "पर" का। यदि आप
स्वयं अपने राष्ट्र को अपना कर्तव्य, अपना सब कुछ मानते हैं, उसकी उन्नति
में अपना योगदान देते हैं, तभी तो आप स्वतंत्र हुए। केवल आजादी ही इसका
मतलब कैसे हुआ? यदि आपके मन माफिक, आपके कर्म से और आपके कर्तव्य से यह
समाज नहीं चल रहा, यह राष्ट्र नहीं चल रहा तो आप परतंत्र हैं। आजादी का
झूठा बोध अपने अन्दर न लेकर आयें। हर अधिकार एक कर्तव्य के साथ आता है; यदि
कर्तव्य निर्वहन में हम कुछ नहीं कर रहे तो अधिकार में यथेच्छ कैसे
मिलेगा। आपकी आजादी एक दिवा स्वप्न है। जब तक भारत का हर एक नागरिक कर्तव्य
निर्वाह करने के लिए आगे नहीं बढेगा; तब तक वह परतंत्र है स्वतंत्र नहीं।
बड़ा असभ्य महसूस करता हूँ मैं भारत में रहने में जब सुबह सुबह अखबारों में खबर पढता हूँ कि एक समाज की, एक धर्म की, एक जाति की अनदेखी हो रही है और वह समाज आन्दोलन करेगा। भारत का संविधान सबको बराबरी का अधिकार प्रदान करता है फिर भी न तो सरकारें संजीदा हैं और न ही समाज संजीदा है। हम बराबरी पर तभी रख पायेंगे किसी को यदि यह समाज एक समाज कहलाएगा। अनेकता की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है तो केवल एकता की। जब हम भूल जायेंगे कि हम किसी फलां जाति /धर्म के सदस्य हैं और भारत के नागरिक मानेगे स्वयं को तभी संविधान की सत्ता इस राष्ट्र में स्थापित होगी। वरना यह सब दिवा स्वप्न के अलावा कुछ नहीं है।
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